
मणिपुर में 21 सितंबर को 17 वर्षीय एनके विफ़ेनबो की हत्या के बाद पिछले दो दिनों में सात लोगों की मौत हो गई है। सभी मृतक नगा समुदाय से हैं। यह हिंसा कुकी-जो और तांगखुल नगा जनजातियों के बीच चल रही है, जिसकी जड़ें भूमि विवाद और ऐतिहासिक टकराव में हैं। सुरक्षा बलों की तैनाती और सरकारी वार्ता के बावजूद हिंसा जारी है।
AI-generated summary
मणिपुर में मई 2023 से मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के बीच जातीय संघर्ष चल रहा है। हाल की हिंसा फरवरी 2024 में उखरुल जिले के लिटन गांव में शराब के नशे में हुई हाथापाई के बाद शुरू हुई, जिसमें कुकी और नगा युवकों के बीच झगड़ा हुआ और अगले दिन चरमपंथी समूहों ने घरों को आग लगा दी। इस संघर्ष की जड़ें 1950 के दशक से चली आ रही क्षेत्रीय विवाद और 1992-1998 के बीच हुई हिंसक झड़पों में हैं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों बेघर हो गए।
Author, दिलीप कुमार शर्मा
पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
प्रकाशित 2 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 8 मिनट
मणिपुर में 21 सितंबर को 17 साल के एनके विफ़ेनबो खाने-पीने का सामान खरीदने तामेई शहर की तरफ़ जा रहे थे.
लेकिन रास्ते में कुछ हथियारबंद हमलावरों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. 11वीं क्लास में पढ़ने वाले विफ़ेनबो मणिपुर के तमेंगलोंग जिले के अपर न्कोउ गाँव के रहने वाले थे.
इस घटना से पूरी तरह टूट चुके उनके पिता माहिनलाकबोउ ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा,"मेरे निर्दोष बेटे की इतनी बेरहमी से हत्या कर दी गई, उसकी क्या गलती थी?"
लियांगमाई नगा जनजाति से ताल्लुक रखने वाले विफ़ेनबो पर यह हमला दिन के करीब साढ़े दस बजे हुआ था.
इस घटना के महज़ एक सप्ताह पहले 15 सितंबर को तमेंगलोंग जिले के लेइसंगफ़ाई गाँव में संदिग्ध चरमपंथियों ने खेत में काम कर रही दो महिलाओं की हत्या कर दी थी.
हमले में मारी गईं 60 साल की चोंगा सिटलहौ और 30 साल की किमबोई सिंगसन, कुकी जनजाति से थीं.
किमबोई ने हाल ही में अपनी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी की थी. जिस वक्त उन पर हमला हुआ था वह खेत में अपनी माँ की मदद कर वापस लौट रही थीं.
दो दिनों में सात लोगों की हत्या
इस बीच, सेनापति ज़िले में शनिवार को हुए एक हमले में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है.
छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें
सबसे अधिक पढ़ी गईं
समाप्त
यह हमला कालेनजांग गाँव के मुखिया के घर के अंदर किया गया, जहां पीड़ित मौजूद थे.
इस तरह पिछले दो दिनों में सात लोगों की हत्या हुई है. मरने वाले सभी लोग नगा समुदाय से थे.
मणिपुर में पिछले करीब सात महीनों में कम से कम 50 लोगों की हत्या की जा चुकी है.
दरअसल मणिपुर में मई 2023 से मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के बीच पहले से ही जातीय संघर्ष चल रहा है.
हालांकि, ताज़ा हिंसा कुकी-जो जनजाति और तांगखुल नगा जनजाति के बीच हो रही है. ये दोनों जनजातियां प्रदेश के 11 पहाड़ी जिलों में बसी हैं.
सेनापति, उखरूल, तामेंगलांग, कामजोंग और नोनी जिले में नगा लोगों का वर्चस्व है जबकि चुराचांदपुर,कांगपोकपी,टेंगनौपाल और चंदेल में कुकी का दबदबा है.
बाकी के जिलों में दोनों जनजातियों की मिश्रित आबादी रहती है.
कैसे शुरू हुई हिंसा, दोनों जनजातियों के टकराव का इतिहास क्या है?
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
एपिसोड
समाप्त
दरअसल, इस साल सात फरवरी को उखरुल ज़िले के लिटन गांव में कुकी और नगा जनजाति के कुछ युवकों के बीच कथित तौर पर शराब के नशे में हाथापाई हो गई थी.
इस घटना के दूसरे दिन कुछ हथियारबंद बदमाशों ने गांव के दर्जनों घरों को आग लगा दी और इस तरह दोनों जनजातियों के बीच खूनी संघर्ष शुरू हुआ.
इस हिंसा के नहीं रुकने की एक बड़ी वजह दोनों समुदाय से निकले चरमपंथी समूहों को बताया जाता है.
मणिपुर में लंबे समय से हिंसा ग्रस्त इलाकों में काम करते आ रहे मानवाधिकार कार्यकर्ता के.ओनिल कहते हैं, "कुकी-नगा संघर्ष का पुराना इतिहास रहा है. भले ही दोनों कबीले ईसाई धर्म को मानते हैं लेकिन टकराव की मूल वजह जमीन है."
"दरअसल नगा बहुल इलाकों में कुकी अपना नियंत्रण चाहते हैं, जिसकी वजह से हिंसा हो रही है. असल में कुकी पूरे इलाके में फैले हुए हैं जबकि नगा लोग एक ख़ास इलाके में बसे हैं, दोनों के बीच यह जातीय अंतर है."
के.ओनिल बताते हैं, "नगा बहुल उखरूल, कामजोंग जैसे जिलों में कुकी बसे हुए हैं लेकिन कुकी बहुल इलाकों में नगा नहीं रहते हैं. यह एक बड़ी समस्या है."
" इस साल फरवरी में दोनों जनजातियों के बीच टकराव भले की किसी सामान्य झगड़े से शुरू हुआ लेकिन दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई काफ़ी पुरानी है."
पहाड़ों पर रहने वाली दोनों जनजातियों के बीच 1950 के दशक से क्षेत्रीय विवाद चला आ रहा है.
1992 से 1998 के बीच दोनों जनजातियों में व्यापक स्तर पर हिंसक झड़पें हुईं जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई.
दरअसल 1992 में भारत-म्यांमार सीमा से सटे मोरेह के पास कुकी नेशनल आर्मी के 18 साल के एक कैडर ओंखोलेत हाओकिप की हत्या कर दी थी.
जिसके बाद कुकी और नगा सशस्त्र समूहों के बीच हिंसा का एक लंबा दौर चला. छह साल से भी ज्यादा लंबी चली हिंसा में करीब एक हज़ार कुकी और लगभग 400 नगा लोगों की जान गई थी.
उस दौरान सैकड़ों की तादाद में लोगों के मकान जलाए गए. कम सेकम 50 हज़ार से अधिक लोगों के बेघर होने की बात कही गई.
आम लोगों की हत्याओं में शामिल चरमपंथी समूह
बीती फ़रवरी से शुरू हुई इस हिंसा में अब तक जितने भी लोगों की मौत हुई है, उसके लिए नागरिकों ने चरमपंथी समूहों को जिम्मेदार ठहराया है.
एक तरह से देखा जाए तो इस लड़ाई में नागरिक एक-दूसरे की जान नहीं ले रहे हैं. सभी हमलों में चरमपंथी समूहों पर ही आरोप लग रहे हैं.
हाल के दिनों में नगा लोगों की हत्या के बाद नगा जनजाति के प्रमुख संगठनों ने जितनी दफ़ा बयान जारी किए हैं, उनमें 'सस्पेंशन ऑफ़ ऑपरेशन्स' के तहत काम कर रहे कुकी हथियारबंद चरमपंथियों पर आरोप मढ़े हैं.
जबकि कुकी-ज़ो जनजाति के प्रमुख नागरिक संगठन इन हत्याओं के पीछे एनएससीएन-आईएम और ज़ेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट-कामसन नामक चरमपंथी गुट का नाम लेते रहे हैं.
कुकी जनजाति के प्रमुख संगठन कुकी इंपि मणिपुर के प्रवक्ता लुन किपगेन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "नगा समुदाय के कुछ लोगों ने एक साज़िश के तहत इस टकराव की शुरूआत की है. वरना फरवरी में कुछ युवकों के बीच हुए सामान्य झगड़े को इतनी बड़ी हिंसा का रूप नहीं देते."
वह दावा करते हुए आगे कहते हैं, "यह लड़ाई ज़मीन के अधिकार और ज़मीन पर वर्चस्व की नहीं है क्योंकि दोनों ही जनजाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है. दरअसल तांगखुल नगा समुदाय के कुछ लोग लंबे समय से इस संघर्ष की योजना बना रहे थे. यही कारण है कि टकराव की शुरूआत नगा बहुल उखरूल से हुई."
मौजूदा हिंसा में चरमपंथियों की संलिप्तता से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए किपगेन ने कहा, "तांगखुल नगा चाहते हैं कि जमीन पर और प्रशासनिक स्तर पर मणिपुर के पहाड़ी जिलों पर केवल उनका वर्चस्व हो. एसएससीएन-आईएम लंबे समय जो ग्रेटर नागालिम की मांग कर रहा है. यह लड़ाई उसी योजना का हिस्सा है."
वह यह भी कहते हैं, "तांगखुल इस संघर्ष में पूरे नगा समुदाय को शामिल कर रहा है जबकि यह लड़ाई लियांगमाई , तांगखुल और कुकी के बीच हो रही है. बाकि जिलों में कुकी और अन्य नगा जनजातियों के बीच कोई दिक्कत नहीं है."
भारत सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल एसएससीएन-आईएम यानी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नगालैंड-आईएम, पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे पुराना और नगा चरमपंथियों का सबसे बड़ा समूह है.
इस समय एसएससीएन-आईएम का नेतृत्व थुइंगालेंग मुइवा कर रहे हैं जो मणिपुर के तांगखुल जनजाति से हैं.
क्यों नहीं रुक रही हिंसा?
मणिपुर के पहाड़ी जिलों में चल रही जातीय हिंसा को नियंत्रण करने के लिए सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स समेत असम राइफ़ल्स और भारतीय सेना के हज़ारों जवानों को तैनात किया गया है.
लेकिन अब तक हिंसा से जुड़ी घटनाओं में कमी देखने को नहीं मिली है.
हाल ही में कांगपोकपी में तीन ग्रामीणों की हत्या के मामले में जिले के पुलिस अधीक्षक राहुल गुप्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा था, "पुलिस ने मामला दर्ज किया है और अपराधियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जा रही है."
जबकि मणिपुर सरकार में गृह विभाग के एक अधिकारी ने बताया, "अपराधियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा एजेंसियां ठोस कार्रवाई कर रही हैं. इसके अलावा दोनों समुदाय के साथ केंद्र सरकार के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में बातचीत की जा रही है. प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण करने के लिए सभी कदम उठाए जा रहे हैं."
इस बीच शनिवार को गुवाहाटी में भारत सरकार और मणिपुर सरकार के साथ हुई त्रिपक्षीय बातचीत में बनी सहमति के बाद यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने आर्थिक नाकाबंदी को रोकने की घोषणा की है.
पिछले करीब छह महीने से नगा संगठन ने प्रदेश से गुज़रने वाले कई राजमार्गों पर आर्थिक नाकाबंदी कर रखी थी.
राज्य सरकार के एक अधिकारी ने बताया, "जातीय तनाव को दूर करने और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए शीर्ष अधिकारियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की मौजूदगी में यूनाइटेड नगा काउंसिल के साथ बैठकें की हैं."
"जिन निर्दोष नागरिकों की हत्या की गई है, उन मामलों की अलग-अलग जांच की जा रही है. एनआईए को भी कुछ गंभीर मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है."
"हमने हिंसा भड़का रहे कुछ कुकी-ज़ोमी हथियारबंद समूहों के साथ 'सस्पेंशन ऑफ़ ऑपरेशन्स' समझौते को रद्द करने की भी मांग रखी है."
AI outlook — possibilities, not facts
यूनाइटेड नगा काउंसिल द्वारा आर्थिक नाकाबंदी रोके जाने की घोषणा के बाद भी हिंसा में तत्काल कमी नहीं आएगी
Likely · Within weeks
एनआईए द्वारा गंभीर मामलों की जांच शुरू की जाएगी और कुछ गिरफ्तारियां हो सकती हैं
Possible · Within months
कुकी-ज़ोमी हथियारबंद समूहों के साथ 'सस्पेंशन ऑफ़ ऑपरेशन्स' समझौते को रद्द करने की मांग मान ली जाएगी
Possible · Within months
The United States rejected Iran's proposal to reopen the Strait of Hormuz because Tehran demanded sanctions relief and access to frozen assets before nuclear talks, according to US Ambassador Mike Waltz. Iran's Foreign Minister disputed the account, while Trump indicated bombing could resume after the November midterm elections.
South Africa's anti-immigration movement March and March has declared a September 30 deadline for undocumented foreigners to leave the country, triggering fears of violence among refugee communities ahead of November 4 local elections, with refugees reporting increased threats and hiding due to scapegoating, while the government has intensified deportations and warned against vigilante enforcement.

'Devbhoomi Cultural Festival-2026' was organized in Badrinath Dham on 19-20 September 2026, in which programs were held with loud music and DJ. After the video went viral on social media, a controversy started as to who gave permission for such a program near the temple and whose responsibility is it. Chamoli district administration says that the program was organized by the army and no prior permission was taken from the administration, while the official side of the army has not come out yet.
Afghanistan reports killing 28 and capturing 32 suspected Islamic State insurgents in Nuristan, alleging they were sent by Pakistan. Pakistan rejects the claims as baseless, citing a lack of evidence and accusing Kabul of manufacturing connections to hide internal militancy.

In Indonesia, tourists and content creators are violating safety rules in dangerous areas of the volcano in order to make exciting videos for social media. This not only puts their lives in danger, but also puts huge pressure on the rescue teams.

The number of tourists breaking rules for creating social media content on Indonesia's active volcanoes is increasing. Officials and rescue workers have warned that this trend is posing a life-threatening risk not only to tourists but also to rescue teams.