ट्रंप के सामने भी वही आर्थिक चुनौती, जिसने बाइडन को सत्ता से बाहर कर दिया था
अमेरिका में आर्थिक आंकड़े भले ही मजबूत दिख रहे हों, लेकिन महंगाई और रोज़मर्रा के खर्चों को लेकर मतदाताओं में नाराज़गी बनी हुई है, जो डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
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अमेरिका में मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बावजूद मतदाता महंगाई से परेशान हैं। जो बाइडन की तरह अब डोनाल्ड ट्रंप को भी इसी आर्थिक विरोधाभास और जनआक्रोश का सामना करना पड़ रहा है, जहां रोज़मर्रा के खर्च लोगों की मुख्य चिंता बने हुए हैं।
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Why It Matters
अमेरिकी मतदाताओं में महंगाई और रोज़मर्रा के खर्चों को लेकर असंतोष है, जैसी चुनौती जो बाइडन को भी झेलनी पड़ी थी।
व्हाइट हाउस के सामने एक जानी-पहचानी दुविधा है.
अमेरिका के आर्थिक आंकड़े बहुत खराब नहीं दिखते, लेकिन वहां की जनता की राय कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.
यही विरोधाभास 2024 में जो बाइडन के लिए बड़ी चुनौती बना था. उस समय आर्थिक आंकड़े काफी हद तक मजबूत थे, लेकिन वे कई मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने में नाकाम रहे कि अर्थव्यवस्था उनके हित में काम कर रही है.
अब डोनाल्ड ट्रंप के सामने भी इसी तरह की चुनौती है.
2024 के चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने मतदाताओं से महंगाई से जल्द राहत दिलाने का वादा किया था.
उन्होंने कहा था, "मेरे जीतते ही मैं कीमतें तुरंत कम कर दूंगा."
लेकिन इस वादे को पूरा करना उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल साबित हुआ है.
अमेरिका की आर्थिक विकास दर अब भी स्थिर है, बेरोज़गारी दर कम बनी हुई है और शेयर बाज़ार अपने रिकॉर्ड स्तर के करीब है.
लेकिन मध्यावधि चुनाव से पहले आई महंगाई की ताज़ा रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है, जिसे मतदाता पहले से ही महसूस कर रहे हैं- चीज़ों की कीमतें अब भी ऊंची बनी हुई हैं.
हालांकि, दोनों राष्ट्रपतियों के सामने चुनौतियों की वजहें अलग-अलग हैं.
बाइडन को कोविड महामारी के बाद पैदा हुए आर्थिक हालात से निपटना पड़ रहा था.
वहीं, ट्रंप को ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है. इसकी एक वजह ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल का संघर्ष है. इसके अलावा, उनकी कुछ व्यापार और इमिग्रेशन नीतियों के असर भी सामने आ रहे हैं.
हालांकि, राजनीतिक रूप से दोनों के सामने स्थिति काफी हद तक एक जैसी है.
मतदाता अर्थव्यवस्था का आकलन जीडीपी के आंकड़ों या शेयर बाज़ार के रिकॉर्ड स्तर से नहीं करते.
वे यह देखते हैं कि सुपरमार्केट में सामान खरीदने के लिए उन्हें कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं, पेट्रोल कितना महंगा है और क्या वे अपने रोज़मर्रा के खर्च उठा पा रहे हैं.
अमेरिका की अर्थव्यवस्था में 2.2 फ़ीसदी की वृद्धि कई अमीर देशों के मानकों के हिसाब से अच्छी मानी जाएगी.
मिसाल के तौर पर, जर्मनी को इतनी तेज़ आर्थिक वृद्धि हासिल करने में मुश्किल हो रही है. वहीं, अमेरिका में बेरोज़गारी दर 4.2 फ़ीसदी पर स्थिर है. इससे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि वहां की अर्थव्यवस्था तेज़ी से गिरावट की ओर बढ़ रही है.
ट्रंप का तर्क है कि उन्हें बाइडन से ख़राब आर्थिक हालात विरासत में मिले थे. वह आर्थिक वृद्धि, निवेश और शेयर बाज़ार के अच्छे प्रदर्शन को इस बात के सबूत के तौर पर पेश करते हैं कि उनकी नीतियां काम कर रही हैं.
महंगाई के ताज़ा आंकड़े आने के बाद व्हाइट हाउस के प्रवक्ता मैथ्यू मिडलटन ने कहा कि मौजूदा प्रशासन के "आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाले एजेंडे" ने "बाइडन के दौर के महंगाई संकट" के असर को कम किया है.
ट्रंप के सहयोगी और आर्थिक मामलों के टिप्पणीकार लैरी कुडलो ने मौजूदा आर्थिक विस्तार को "अब तक की सबसे बड़ी कहानी" बताया. उन्होंने यह भी दावा किया कि "किसी की नौकरी नहीं जाने वाली है."
लेकिन मतदाता इस स्थिति को अलग नज़रिए से देख रहे हैं. उनके लिए कहानी यह है कि ट्रंप ने महंगाई और रोज़मर्रा के ख़र्च का बोझ कम करने के वादे पर राष्ट्रपति चुनाव जीता था, लेकिन कीमतें अब भी बढ़ रही हैं.
इसकी एक वजह यह है कि वेतन में बढ़ोतरी, कीमतों में हुई वृद्धि के बराबर नहीं रही है.
पिछले एक साल में औसत प्रति घंटा वेतन में तीन फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें 3.7 फ़ीसदी बढ़ीं.
यही वजह है कि सर्वेक्षणों में मतदाता अर्थव्यवस्था को संभालने के ट्रंप के तरीके को लगातार ख़राब रेटिंग दे रहे हैं.
डेमोक्रेट्स के लिए यह स्थिति नई नहीं है.
डेमोक्रेटिक पार्टी की अनुभवी चुनावी सर्वेक्षक सेलिंडा लेक कहती हैं कि समस्या की शुरुआत इस बात से होती है कि अर्थशास्त्री और आम मतदाता एक ही शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग मतलब के लिए करते हैं.
वह कहती हैं, "जब अर्थशास्त्री कहते हैं कि महंगाई कम हो गई है, तो उनका मतलब होता है कि कीमतें बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो गई है."
वह समझाती हैं, "लेकिन जब मतदाता कहते हैं कि महंगाई कम हो गई है, तो उनका मतलब होता है कि कीमतें पहले के स्तर पर लौट ई हैं. जबकि ऐसा कभी नहीं होता."
बाइडन प्रशासन ने 2024 का ज़्यादातर समय कम बेरोज़गारी, मज़बूत आर्थिक वृद्धि और कम महंगाई को अपनी उपलब्धियों के तौर पर पेश करने में बिताया.
हालांकि, कई मतदाता रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बढ़ती कीमतों से अब भी परेशान थे.
सेलिंडा लेक ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में बाइडन के अभियान को सलाह दी थी, लेकिन 2024 के चुनाव में वह शामिल नहीं थीं. उनका कहना है कि मतदाता अर्थव्यवस्था का आकलन आर्थिक आंकड़ों के बजाय अपने निजी अनुभवों के आधार पर करते हैं.
वह कहती हैं, "आप लोगों को उनकी ज़िंदगी की हक़ीक़त के बारे में बहस करके नहीं मना सकते."
इससे शायद यह समझने में मदद मिलती है कि ट्रंप के सामने भी वैसी ही चुनौती क्यों है, जैसी बाइडन के सामने थी.
बाइडन के आलोचकों ने महंगाई के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया था. हालांकि, वह महामारी और सप्लाई चेन पर उसके असर जैसे उन कारणों की ओर इशारा कर सकते थे, जो काफी हद तक उनके नियंत्रण से बाहर थे.
ट्रंप के पास ऐसा करने की गुंजाइश कम है.
कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि आज कीमतें बढ़ने की एक वजह ट्रंप प्रशासन की अपनी नीतियां भी हैं. इनमें टैरिफ़ के साथ-साथ ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इसराइल के युद्ध के आर्थिक असर भी शामिल हैं.
रिपब्लिकन विचारधारा से सहमति रखने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड के अर्थशास्त्री पीटर मोरिसी कहते हैं, "महंगाई के लिए साफ़ तौर पर डोनाल्ड ट्रंप ज़िम्मेदार हैं."
वह कहते हैं, "ये उनके टैरिफ़ और युद्ध का नतीजा है. लोग यह जानते हैं. वे इसे देख रहे हैं."
अप्रैल 2025 में घोषित ट्रंप के 'लिबरेशन डे' टैरिफ़ से उपभोक्ताओं के लिए सामान की कीमतें बढ़ी हैं.
न्यूयॉर्क के फ़ेडरल रिज़र्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक, इन टैरिफ़ की वजह से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में करीब 2.9 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.
अगर ट्रंप ने बाद में कुछ टैरिफ़ पर रोक नहीं लगाई होती, नए व्यापार समझौते नहीं किए होते और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल से कई अन्य आयात शुल्क लगाने से उन्हें नहीं रोका होता, तो इसका असर और भी ज़्यादा हो सकता था.
इसके बाद एक और झटका लगा.
ईरान के साथ संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ गईं. इससे पेट्रोल की कीमतों में इज़ाफ़ा हुआ और परिवारों के बजट पर दबाव और बढ़ गया.
व्हाइट हाउस टैक्स में कटौती, रोज़गार में बढ़ोतरी और दवाओं की कम कीमतों को इस बात के सबूत के तौर पर पेश कर रहा है कि सरकार अमेरिकी परिवारों के लिए काम कर रही है.
ट्रंप ने क्रेडिट कार्ड पर ब्याज दरों की अधिकतम सीमा तय करने की मांग की है। उन्होंने यह विचार भी रखा है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस में अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो हर अमेरिकी वयस्क को 5,000 डॉलर दिए जा सकते हैं.
अब मध्यावधि चुनावों से पहले सवाल यह है कि क्या ट्रंप ऐसा कर पाएंगे?
हाल के राजनीतिक इतिहास को देखें, तो अर्थव्यवस्था के बारे में लोगों की धारणा, खुद आर्थिक आंकड़ों से ज़्यादा मायने रख सकती है.
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
मध्यावधि चुनावों से पहले अर्थव्यवस्था और महंगाई मुख्य राजनीतिक मुद्दा बने रहेंगे।
Very likely · Within months
Open Questions
- क्या ट्रंप प्रशासन मध्यावधि चुनाव से पहले महंगाई को नियंत्रित कर पाएगा?
- क्या प्रस्तावित कर कटौती और नकद सहायता से मतदाताओं का गुस्सा शांत होगा?



