लद्दाख का 'याक चुरपी' चीज़: ब्राज़ील में गोल्ड मेडल जीतने वाली अनोखी कहानी
लद्दाख के घुमंतू याक पालकों द्वारा बनाया जाने वाला चुरपी चीज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इसके भविष्य के लिए चुनौती बना हुआ है।
Quick Look
लद्दाख के थिनले नुरबू द्वारा निर्मित याक चुरपी चीज़ ने ब्राज़ील में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता है। यह पारंपरिक उत्पाद अब वैश्विक स्तर पर चर्चा में है, हालांकि जलवायु परिवर्तन और उत्पादन की चुनौतियां इसके भविष्य पर असर डाल रही हैं।
AI-generated summary
Why It Matters
लद्दाख के घुमंतू समुदायों में पीढ़ियों से याक के दूध से चुरपी बनाया जाता रहा है। यह उत्पाद अब तक स्थानीय स्तर तक ही सीमित था।
जब आप चीज़ के बारे में सोचते हैं तो आपके दिमाग़ में सबसे पहले क्या आता है?... क्यूब्स, स्लाइस, या पिज़्ज़ा पर पिघला हुआ चीज़ ... आमतौर पर हम इन्हीं के बारे में सोचते हैं। लेकिन इन सबसे इतर एक ख़ास क्षेत्र में वहां का स्थानीय चीज़ खानपान का अहम हिस्सा रहा है। हम बात कर रहे हैं लद्दाख के याक चुरपी की। इस चीज़ ने कुछ महीने पहले ब्राज़ील में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता था। लद्दाख की यात्रा के दौरान हमने इस ख़ास चीज़ के बारे में और इसे बनाने की प्रक्रिया के बारे में पता लगाया।
लद्दाख की याक चुरपी चीज़ ने ब्राज़ील में आयोजित मुंडियाल डो क्वेजो डो ब्राज़ील 2026 कॉम्पिटीशन में गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद से यह चीज़ चर्चा का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल सोशल मीडिया पर इसकी तारीफ़ की, बल्कि 'मन की बात' में भी इसका ज़िक्र किया। इस चीज़ को सबसे पहले थिनले नुरबू ने बनाया था। लद्दाख के एक घुमंतू परिवार में जन्मे थिनले याक पालते हैं।
लद्दाख के घुमंतू समुदायों के घरों में पीढ़ियों से चुरपी या छुरा नामक चीज़ बनाया जाता रहा है। लेकिन अब तक इस चीज़ के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। इसकी वजह है कि इस चीज़ का निर्यात अब तक लद्दाख से बाहर नहीं हुआ है। यह चीज़ आपको लेह के बाज़ारों में भी आसानी से नहीं मिलेगा। इसीलिए हमने इसके बारे में पता लगाने के लिए अपनी यात्रा शुरू की।
जैसे ही हम चांग-ला को पार करके पहाड़ी रास्ते से नीचे उतरना शुरू करते हैं, हमें सड़क के दोनों ओर पहाड़ दिखाई देते हैं। चांगथांग क्षेत्र के सोलटाक में थिनले नुरबू का एक 'घुमंतू फ़ार्म' है। थिनले यहां अपने माता-पिता, रिश्तेदारों और लगभग 100 याकों के साथ रहते हैं। यहां की ऊंचाई समुद्र तल से 16,500 फ़ुट है। यहां कोई बस्ती नहीं है। बस बीच में एक घर या सड़क के किनारे एक छोटा सा होटल है।
यहाँ दिन का पहला काम याक का दूध दुहना है। लद्दाखी भाषा में मादा याक को दिमो कहते हैं। एक दिमो लगभग 1 लीटर दूध देती है। थिनले के पिता हमें बताते हैं, "सुबह दूध दुहने के बाद मैं उस दिन दोबारा दूध नहीं दुहता। वो बच्चों के लिए होता है।" दूध निकालने के बाद सभी याकों को सामने वाली घाटी में चरने के लिए छोड़ दिया जाता है।
चीज़ बनाने के लिए याक के ताज़ा दूध को गर्म किया जाता है और उसमें थोड़ा दही मिलाकर रख दिया जाता है। फिर, अगले दिन जमे हुए दही से चीज़ बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। जब इस दही को मथने वाली मशीन में डाला जाता है, तो इससे मक्खन और छाछ बनता है। इस मक्खन को 'बटर' के रूप में बेचा जाता है या इससे घी बनाया जाता है। मक्खन निकालने के बाद बचे हुए छाछ को उबाला जाता है। कुछ घंटों तक उबालने के बाद रिकोटा चीज़ जैसा दिखने वाला एक पदार्थ ऊपर तैरने लगता है। रिकोटा इतालवी शब्द है और इसका मतलब है- दोबारा पकाया हुआ। लद्दाखी भाषा में इसे लाबू कहते हैं।
लाबू से पानी निकालने के लिए इसे एक कपड़े में लटकाया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ भी पदार्थ बर्बाद नहीं होता। पनीर निकालने के बाद जो पानी बचता है उसमें मट्ठा प्रोटीन होता है। इस पौष्टिक पानी को फिर से याक को पीने के लिए दिया जाता है। थिनले की मां फिर इस लाबू को छोटे-छोटे टुकड़ों में सुखाती हैं। तेज गर्मी में यह चीज़ 2-3 दिनों में सूखकर तैयार हो जाता है। लद्दाखी व्यंजनों में इस चीज़ का इस्तेमाल सूप और स्टू बनाने में किया जाता है।
थिनले कहते हैं, "मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था। मैं दसवीं में फेल हो गया था। यहाँ लद्दाख में सोनम वांगचुक मेरे जैसे असफल बच्चों के लिए एक स्कूल चलाते हैं। उनका नाम सेकमोल है। मेरा भाई मुझे वहाँ ले गया था। वहीं से मैंने सीखा, हमारा पारंपरिक पेशा क्यों महत्वपूर्ण है। सोनम सर की वजह से ही मैं आज इस मुकाम पर हूं। उन्होंने मुझे अपने माता-पिता के साथ यहीं रहने और काम करने, नई चीज़ें करने के लिए प्रेरित किया।"
थिनले ने रेसिपी में थोड़ा बदलाव करके और चीनी मिलाकर पारंपरिक चुरपी चीज़ का एक नया वर्ज़न तैयार किया है। अब उनका ध्यान इस पर फ़ोकस्ड है कि इस चीज़ को और बेहतर कैसे बनाया जाए और इसका उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए।
ब्राज़ील में मुंडियाल डो क्वेजो डो ब्राज़ील 2026 प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें दुनियाभर के चीज़ उत्पादकों ने हिस्सा लिया। थिनले ने प्रतियोगिता के मानदंडों को पूरा करते हुए चीज़ बनाया। लेकिन समय पर येलो फ़ीवर का टीका न लगवा पाने की वजह से वह ब्राज़ील की यात्रा नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने अपने चीज़ की एंट्री राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड के अधिकारियों के पास भेजी और फिर इस प्रतियोगिता में 'विश्व का सर्वश्रेष्ठ चीज़' के रूप में उनके चीज़ ने गोल्ड मेडल जीता।
लेह के पशुपालन विभाग के प्रमुख डॉ. स्टैनज़िन राबग्यास कहते हैं, "हमने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ साझेदारी की है। हम चुरपी चीज़ के उत्पादन के लिए एक विशेष प्रक्रिया बनाएंगे और इसकी ब्रांडिंग करके इसे एक विशेष उत्पाद के रूप में कैसे बाज़ार में उतारा जाए, इन सबको लेकर स्टडी कर रहे हैं।"
जलवायु परिवर्तन का असर लद्दाख घाटी में भी महसूस किया जा रहा है। थिनले के पिता याद करते हुए कहते हैं, "पहले हमारे सामने पहाड़ पर पूरी तरह बर्फ़ जमी रहती थी। अब वैसी बर्फ़ नहीं दिखती। सब कुछ गायब हो गया है। गर्मी बहुत बढ़ गई है। पहले दो महीने तक हरियाली रहती थी, फिर बर्फ़ जमने लगती थी। अब तो हर दो फ़ीट पर भी बर्फ़ नहीं जमती। मौसम पूरी तरह बदल गया है।" थिनले का भी यह कहना है कि पहाड़ों पर अब पहले की तुलना में कम बर्फ़ है और ग्लोबल वार्मिंग के कारण चारागाहों पर बुरा असर पड़ रहा है।
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
लद्दाख प्रशासन चुरपी के उत्पादन और ब्रांडिंग के लिए नई नीतियां लागू करेगा।
Likely · Within months
Open Questions
- क्या चुरपी का बड़े पैमाने पर निर्यात संभव है?
- जलवायु परिवर्तन के कारण याक पालन में कितनी गिरावट आई है?


