
ईरान के प्रभाव में कमी के बाद सीरिया में इसराइल और तुर्की के बीच भू-राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता तेज हो गई है।
सीरिया में ईरान का प्रभाव कम होने के बाद इसराइल और तुर्की के बीच सीधा टकराव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की की बढ़ती सैन्य क्षमता और नेटो सदस्यता इसराइल के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौतियां पेश कर रही है, जबकि नेतन्याहू सरकार की आक्रामक नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
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इसराइल और तुर्की के बीच सीरिया में प्रतिद्वंद्विता वैचारिक और भू-राजनीतिक है। तुर्की एक एकीकृत सीरिया चाहता है, जबकि इसराइल अपनी सुरक्षा के लिए एक कमजोर सीरिया को प्राथमिकता देता है।
इसराइल का गठन 14 मई 1948 को हुआ था और तुर्की ने एक साल से भी कम समय में 28 मार्च 1949 को उसे मान्यता दे दी थी.
तुर्की पहला मुस्लिम बहुल देश था, जिसने इसराइल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया था. लेकिन क़रीब आठ दशक बाद चीज़ें पूरी तरह से बदलती दिख रही हैं.
इसराइल और ईरान के बीच पिछले साल 12 दिनों तक चले युद्ध ने मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन को काफ़ी हद तक प्रभावित किया था.
इसराइल ज़्यादा आक्रामक देश के रूप में उभरा जबकि ईरान को कई स्तरों पर भारी नुक़सान उठाना पड़ा. अमेरिका ईरान के साथ लंबे संघर्ष में उलझने से बचता दिख रहा है लेकिन इसराइल के भीतर कहा जा रहा है कि ईरान भले कमज़ोर पड़ गया है पर उसकी जगह तुर्की ले सकता है.
18 अगस्त को सीरिया के अबू अल-दुहूर एयरबेस पर इसराइल के हमले और उसके बाद दोनों देशों की ओर से सीधे दी गई चेतावनियों ने एक जटिल सवाल फिर खड़ा कर दिया है: क्या तुर्की और इसराइल सीरिया में टकराव के क़रीब पहुँच रहे हैं?
सीरिया में तुर्की और इसराइल की प्रतिद्वंद्विता को स्ट्रक्चरल माना जाता है, क्योंकि दोनों बिल्कुल अलग नतीजे चाहते हैं.
मर्सिन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के असोसिएट प्रोफ़ेसर बुगरा सारी ने मिडिल ईस्ट मॉनिटर में लिखा है, ''तुर्की एकजुट सीरिया चाहता है, जो अपनी सीमाओं पर नियंत्रण रख सके, हथियारबंद गुटों को अपने ढांचे में शामिल कर सके, इस्लामिक स्टेट और पीकेके से जुड़े ख़तरों को दबा सके और शरणार्थियों की वापसी का रास्ता खोल सके. क़रीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा होने के कारण सीरिया के फिर से बिखरने की सबसे बड़ी क़ीमत तुर्की को चुकानी पड़ेगी.''
प्रोफ़ेसर बुगरा कहते हैं, ''वहीं, इसराइल अपनी सुरक्षा के लिए सीमित और कमज़ोर सैन्य क्षमता वाले सीरिया को बेहतर विकल्प मानता है. वह कमज़ोर हवाई सुरक्षा, सीमित हथियार, क़ब्जे़ वाले गोलान के पास किसी भी शत्रुतापूर्ण ताक़त की ग़ैर-मौजूदगी और सैन्य कार्रवाई की पूरी स्वतंत्रता चाहता है.''
सीरिया में जब तक बशर अल-असद का शासन था तब तक ईरान का प्रभाव था लेकिन अल शरा के आने के बाद तुर्की का प्रभाव बढ़ा है. ऐसे में सीरिया में इसराइल की प्रतिद्वंद्विता अब ईरान से नहीं बल्कि तुर्की से है.
इसराइल के पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट ने इसराइली रेडियो 103 एफ़एम से सोमवार को कहा कि ईरान कमज़ोर होता है तो उसके कारण पैदा हुआ ख़ालीपन कोई न कोई भरेगा.
योआव गैलेंट ने कहा, ''मध्य-पूर्व में इसका स्वाभाविक दावेदार साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं वाला तुर्की है. तुर्की एक शक्तिशाली देश है, जिसकी साम्राज्यवादी विरासत रही है. यह एशिया और यूरोप के बीच स्थित है. अमेरिका को छोड़ दें तो नेटो में उसकी सेना सबसे बड़ी है. उसकी डिफेंस इंडस्ट्री बेहद मज़बूत है, उसके लोग मेहनती हैं और व्यावहारिक रूप से वह यूरोप के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है. तुर्की एक बड़ी ताक़त है और वह पहले से ही कई तरह के क्षेत्रों में अपना प्रभाव और पहुँच बढ़ा रहा है."
थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो एस्ली अयदिनतासबस ने पिछले साल जुलाई में ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स में लिखा था, ''तुर्की और इसराइल के बीच संघर्ष वैचारिक और भू-राजनीतिक, दोनों स्तरों पर है. अर्दोआन की सरकार ने सुन्नी इस्लामी लोकलुभावनवाद को तुर्की के राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया है.''
''वहीं इसराइल में दक्षिणपंथी गठबंधन भी देश के भविष्य को लेकर उतना ही सख़्त नज़रिया रखता है और लेबनान, ग़ज़ा के अलावा सीरिया में सैन्य प्रभुत्व कायम करने की कोशिश कर रहा है. इन दोनों की परस्पर विरोधी विचारधाराओं में समझौते की गुंजाइश बहुत कम है.''
एस्ली ने लिखा था, ''सीरिया टकराव का सबसे तात्कालिक मैदान है. 2024 के अंत में असद शासन के पतन के बाद से दोनों देश युद्ध के बाद की व्यवस्था को अपने हिसाब से आकार देने की कोशिश कर रहे हैं. तुर्की ने सीरिया में अपना प्रभाव बढ़ाया है, अपने सहयोगियों का समर्थन किया है जो अब सत्ता में हैं और अंकारा के अनुरूप एक स्थिर के साथ केंद्रीकृत सरकार की पैरवी की है. तुर्की पहले से ही उत्तरी सीरिया के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है और पूरे देश में अपना आर्थिक के साथ सैन्य प्रभाव बढ़ाना चाहता है.''
''वहीं, इसराइल ने हवाई हमले तेज़ कर दिए हैं. कुर्द और द्रूज स्वायत्तता का समर्थन किया है. वह सीरिया के नए शासकों को संदेह की नज़र से देखता है, क्योंकि उनकी पृष्ठभूमि में जिहादी संबंध रहे हैं. दशकों तक अमेरिकी नीति-निर्माता तुर्की और इसराइल को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम, हालांकि मुश्किल, सहयोगी और स्तंभ मानते रहे.''
''अब ये दोनों स्तंभ सीधे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ दबाव बना रहे हैं. ईरान के कमज़ोर होने के बाद, अमेरिका और उसके सहयोगियों को यह समझना होगा कि मध्य-पूर्व की अगली बड़ी चुनौती उनके दो सबसे क़रीबी साझेदारों के बीच की प्रतिद्वंद्विता से पैदा हो सकती है.''
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, ''ईरान की तुलना में तुर्की के साथ लड़ना इसराइल के लिए बिल्कुल अलग बात है. दोनों ही इस रीजन की मिडिल पावर हैं. ईरान के साथ लड़ने में इसराइल को अमेरिका से मदद मिली. लेकिन तुर्की एक नेटो देश है. नेटो में अगर एक देश पर अटैक होता है, तो उसे सारे नेटो मेंबर पर अटैक के तौर पर देखा जाएगा. यह सबसे बड़ी जटिलता है.''
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, ''इसराइल और तुर्की की सेना को देखें तो तुर्की पिछले 10 साल में अपनी सैन्य क्षमता के मामले में काफ़ी ज़्यादा आत्मनिर्भर हुआ है. उसके पास अपने बनाए ड्रोन हैं, जिन्हें वह एक्सपोर्ट करता है. अब उसने एयरक्राफ्ट भी बनाना शुरू कर दिया है. उसकी मिलिटरी मॉडर्नाइजेशन 1978-80 के आसपास से शुरू हो गई थी, जब अमेरिका ने उस पर एंबार्गो लगाया था. उसके बाद से उसका फोकस रहा है कि दूसरे देशों पर निर्भरता कैसे ख़त्म की जाए. 30-40 सालों में उसने काफ़ी प्रगति की है.''
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, ''मुझे लगता है कि तुर्की के साथ लड़ने के लिए इसराइल के पास उतने साधन नहीं हैं. एरियल कैपेबिलिटी में इसरायल का तुर्की पर थोड़ा एज है लेकिन अमेरिका से एफ-35 तुर्की को मिल गया तो वो भी ख़त्म हो जाएगा. तुर्की की नेवी भी काफ़ी पावरफुल है. इसलिए तुर्की आज की डेट में इसराइल की तुलना में बड़ी शक्ति है.''
तुर्की को यूरोप और अमेरिका की पॉपुलर परसेप्शन में अभी उस तरह से नहीं देखा जाता कि वह कोई वैश्विक ख़तरा है. अमेरिका का रुख़ भी तुर्की के मामले में वैसा नहीं हो सकता, जैसा ईरान के मामले में रहा है. अमेरिका के लिए चाहकर भी ऐसा करना आसान नहीं होगा.
तु्र्की में अमेरिका के राजदूत टॉम बराक ने तुर्की की सीमा के पास सीरियाई एयरफील्ड पर इसराइली हमले का विरोध भी किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका की ओर से मिले आश्वासन और तुर्की की इस पुष्टि के बावजूद कि वह वहाँ सैनिक तैनात नहीं कर रहा है, तब भी हमला हुआ.
लेफ़्ट विंग की पहचान रखने वाले इसराइली अख़बार हारेत्ज़ ने 23 अगस्त को अपने संपादकीय में लिखा था कि प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने चुनाव में फ़ायदे के लिए उत्तरी सीरिया में हवाई हमला कर तुर्की के साथ एक नया मोर्चा खोलने का फ़ैसला किया.
तेल अवीव के मुख्य हाईवे पर लगाए गए एक विशाल होर्डिंग ने तुर्की को प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के चुनाव अभियान के केंद्र में ला दिया. इसमें तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन को ईरान, हिज़्बुल्लाह और न्यूयॉर्क के मेयर के साथ इसराइल के विरोधियों के रूप में दिखाया गया था. होर्डिंग पर लिखा था, "वे चाहते हैं कि नेतन्याहू हारें. उन्हें जीतने मत दीजिए."
हारेत्ज़ ने लिखा है, ''इसराइल को सीरिया और पूरे क्षेत्र में तुर्की के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता करने का अधिकार है. लेकिन क्या इस तरह का हमला तुर्की को पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकता है? क्या सभी कूटनीतिक रास्ते आजमाए जा चुके थे? क्या मोसाद प्रमुख और सीरिया के विदेश मंत्री के बीच एक बार हुई बातचीत लगातार चलने वाली कूटनीतिक प्रक्रिया का विकल्प हो सकती है? तुर्की नेटो का सदस्य और अमेरिका का क़रीबी सहयोगी है. कभी वह इसराइल का भी सहयोगी था और आज भी तेल अवीव में उसका दूतावास है. क्या किसी ने सोचा कि तुर्की के साथ युद्ध कैसा होगा और उसकी क़ीमत क्या होगी?''
''इसराइल को मध्य-पूर्व में सामने आ रही नई और कई तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए नई नीति तैयार करनी होगी. जब नेतन्याहू उत्तरी सीरिया में हुई इस सटीक कार्रवाई पर गर्व कर रहे थे, तब उनके सामने ही नए गठबंधन बन रहे थे और इसराइल उनमें शामिल नहीं था. केवल बमबारी करके सुरक्षा कायम नहीं की जा सकती और न ही हर ख़तरे को ख़त्म किया जा सकता है. बमबारी कूटनीति और सोच-समझकर बनाई गई नीति का विकल्प नहीं हो सकती. नेतन्याहू के दौर में इन दोनों का महत्व लगातार कम होता गया है. इसराइल को अमेरिकी राजदूत टॉम बराक की चेतावनियों पर ध्यान देना चाहिए और तुर्की के साथ टकराव में फँसने से बचना चाहिए.''
नॉर्वे के राजनीति विज्ञानी ग्लेन एरिक आंद्रे डाइसन के साथ बातचीत में सऊदी अरब में अमेरिका के राजदूत रहे चार्ल्स फ़्रीमैन ने कहा कि इसराइल के पास लंबे समय तक अस्तित्व के लिए कोई रणनीति नहीं है.
फ़्रीमैन ने कहा, ''वह यह मानकर चलता है कि हमेशा दूसरों पर बंदूक तानकर रह सकता है, लेकिन किसी भी लिहाज से यह अस्तित्व की रणनीति नहीं है. इसलिए इसराइल में उसके एक स्टेट के रूप में लंबे समय तक टिके रहने को लेकर गंभीर आशंकाएं हैं.''
चार्ल्स फ्रीमैन ने कहा, ''इसराइल लंबे समय से सीरिया को अपने नियंत्रण में रखने और अपनी सीमाओं का विस्तार करने की नीति पर काम कर रहा है. इसराइल इसे अपनी सुरक्षा के लिए ज़रूरी मानता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इसराइल की कोई निश्चित सीमाएं नहीं हैं और वह जहाँ चाहे अपनी सीमाएं बढ़ा लेता है. तुर्की में इसराइल के ख़िलाफ़ भारी जनआक्रोश है. एक सर्वे के अनुसार, लगभग 97% तुर्क नागरिक इसराइल के विरोधी हैं. इसराइली नेता नेफ़्टाली बेनेट ने तुर्की को ईरान से भी बड़ा ख़तरा बताया था.''
हारेत्ज़ के वरिष्ठ सुरक्षा विश्लेषक अमोस हरेल ने अमेरिकी ब्रॉडकास्टर सीएनएन से कहा, "वास्तव में ऐसे संकेत हैं कि अर्दोआन का इसराइल के प्रति रुख़ बेहद शत्रुतापूर्ण है और तुर्की सीरिया में कई तरह की सैन्य गतिविधियां कर रहा है. इनमें से कुछ इसराइली सेना के लिए चिंता का विषय हैं, जिसमें वह विशेष एयरपोर्ट भी शामिल है."
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