
बेंगलुरु के लालबाग में 90 वर्षीय पूर्व आईएफएस अधिकारी एएन येलप्पा रेड्डी ने कर्नाटक पार्क संरक्षण (संशोधन) विधेयक के विरोध में 2.8 किमी पैदल मार्च निकाला, जिसमें सैकड़ों नागरिक शामिल हुए। विधेयक में राज्य के पार्कों में 5% भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है, जिसे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जनता के दबाव में वापस ले लिया। येलप्पा रेड्डी ने इस संशोधन को पर्यावरण संरक्षण कानूनों को कमजोर करने की कोशिश बताया और टनल रोड परियोजना से भी जोड़ा, जबकि वैज्ञानिकों में इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर मतभेद हैं।
AI-generated summary
कर्नाटक सरकार ने पिछले महीने कर्नाटक पार्क संरक्षण (संशोधन) विधेयक पारित किया था, जिसमें राज्य के पार्कों में 5% भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था। इस पर पर्यावरणविदों और नागरिकों ने विरोध जताया था।
बेंगलुरु की पहचान माने जाने वाले लालबाग में रविवार सुबह 90 वर्षीय एक बुज़ुर्ग को पैदल चलते देख कई युवाओं की नज़र उन पर टिक गई. उनके पीछे सैकड़ों लोग चल रहे थे.
पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी और पर्यावरणविद् एएन येलप्पा रेड्डी, लालबाग बॉटनिकल गार्डन के पश्चिमी गेट से 2.8 किलोमीटर की पूरी दूरी पैदल चले. उनके साथ एक युवा सहयोगी था, जो औपचारिक तौर पर उनका हाथ थामे हुए था.
लालबाग में सुबह टहलने आने वाले लोग भी प्रदर्शनकारियों के साथ शामिल हो गए. ये लोग कर्नाटक सरकार से कर्नाटक पार्क संरक्षण (संशोधन) विधेयक वापस लेने की मांग कर रहे थे.
विधानसभा ने पिछले महीने यह विधेयक पारित कर दिया था. हालांकि, गुरुवार रात कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इस संशोधन विधेयक को वापस लेने की घोषणा की.
इस संशोधन के तहत सरकार को राज्य भर के पार्कों में पाँच फ़ीसदी जगह सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित करने का अधिकार मिल जाता. अकेले बेंगलुरु में ही 1300 से ज़्यादा पार्क हैं.
अब डीके शिवकुमार ने कहा है कि वो जनता की राय और चिंताओं को ध्यान में रखते हुए ज़रूरी संशोधनों के साथ फिर से विधेयक पेश करेगी.
वहीं येलप्पा रेड्डी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से विधेयक पर सवाल उठाते हुए कहा था, "पाँच फ़ीसदी ही क्यों? एक या दो फ़ीसदी क्यों नहीं? सरकार को पाँच फ़ीसदी तय करने की सलाह किसने दी?"
उन्होंने कहा था, "आगे चलकर सरकारें इसे 10 फ़ीसदी कर देंगी और फिर इससे भी ज़्यादा बढ़ा देंगी. बेंगलुरु की हालत दिल्ली से भी ख़राब हो जाएगी. कम से कम दिल्ली के पास यमुना नदी तो है."
"यह उस पार्क संरक्षण क़ानून और वृक्ष संरक्षण क़ानून को कमज़ोर करने की कोशिश है. ये क़ानून 1976 में तत्कालीन मुख्यमंत्री देवराज अर्स लेकर आए थे."
जब यह क़ानून बना, तब येलप्पा रेड्डी एक युवा रेंज फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर थे. उसी दौरान उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री देवराज अर्स को पर्यावरण से जुड़े एक ख़तरे के बारे में जानकारी देने का मौक़ा मिला.
उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया था कि मैसूरु ज़िले में किसान बड़ी मात्रा में तंबाकू की खेती कर रहे हैं, इससे पर्यावरण को नुक़सान हो सकता है.
येलप्पा रेड्डी ने कहा, "मुख्यमंत्री ने उस समय मैसूरु ज़िले के विधायकों से कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए इस युवा शख़्स की बात सुनिए."
उन्होंने आगे कहा, "तब मैंने विनम्रता से सुझाव दिया कि हमें वृक्ष संरक्षण से जुड़ा क़ानून लाना चाहिए. मुख्यमंत्री तुरंत सहमत हो गए. ऐसा क़ानून लाने वाले वे पहले नेता बने."
टनल रोड परियोजना
येलप्पा रेड्डी और भाजपा के बेंगलुरु दक्षिण से लोकसभा सांसद तेजस्वी सूर्या, दोनों ने पार्क संशोधन विधेयक को टनल रोड परियोजना से जोड़ा था.
लालबाग में जिस जगह विरोध मार्च निकाला गया, उसका भी एक प्रतीकात्मक महत्व था. 1760 में हैदर अली ने 240 एकड़ में फैले लालबाग की शुरुआत करवाई थी. बाद में टीपू सुल्तान ने इसे पूरा कराया था. यहाँ उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय पौधों की 1800 प्रजातियाँ मौजूद हैं.
टनल रोड परियोजना को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार काफ़ी समय से बढ़ावा देते रहे हैं. जब वह सिद्धारमैया सरकार में बेंगलुरु विकास मंत्री थे, तभी से वह इस परियोजना के समर्थक रहे हैं.
16.75 किलोमीटर लंबी उत्तर-दक्षिण टनल सड़क लालबाग की मशहूर चट्टान के नीचे से गुज़रने वाली है. इसके लिए लगभग एक एकड़ ज़मीन का इस्तेमाल होगा.
इस परियोजना की लागत 17,000 करोड़ रुपये से 40,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है.
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इस परियोजना के टेंडर के लिए बोली लगाने वालों में अडानी समूह भी शामिल है. हाल ही में गौतम अडानी ने मुख्यमंत्री से उनके आवास पर मुलाक़ात भी की थी.
तेजस्वी सूर्या ने इस परियोजना के ख़िलाफ़ अभियान तब शुरू किया था, जब पेनिन्सुलर ग्नाइस नामक चट्टान के आसपास पहला सर्वे किया गया था.
बेंगलुरु के संस्थापक केंपेगौड़ा इसी चट्टान का इस्तेमाल निगरानी चौकी के रूप में करते थे.
तेजस्वी सूर्या ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "जब मैंने यह मामला हाई कोर्ट में उठाया, उसके बाद ही वहाँ लगाई गई सीमांकन की टेप हटाई गई."
उन्होंने कहा, "विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) ठेकेदार को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए ज़मीन के इस्तेमाल की अनुमति देती है. इसमें व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाने की इजाज़त भी शामिल है."
उन्होंने आरोप लगाया, "जब यह मामला अदालत में था, तब मुख्यमंत्री ने यह विधेयक पारित करवाया. इसका मक़सद अदालत में दायर जनहित याचिका (पीआईएल) को निष्प्रभावी करना था."
हालाँकि मुख्यमंत्री शिवकुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मैं किसी व्यक्ति विशेष की बात का जवाब नहीं देना चाहता. वे राजनीति कर रहे हैं. उनकी प्राथमिकता राजनीति है."
उन्होंने कहा, "जहाँ टनल बाहर निकलेगी, वहाँ कोई पार्क नहीं है. टनल चट्टान के नीचे से गुज़रेगी. काम पूरा होने के बाद हम उसे फिर भर देंगे. यही योजना है."
उन्होंने आगे कहा, "मैं देखूँगा कि क्या योजना में बदलाव किया जा सकता है. हम इस पर विचार करेंगे."
टनल रोड परियोजना पर वैज्ञानिक क्या कहते हैं?
हालाँकि वैज्ञानिकों की राय इससे अलग है.
भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में जल संसाधन और पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर शेखर मुद्दु का मानना है कि टनल रोड परियोजना से चट्टान को नुक़सान होने की आशंकाएँ सही नहीं हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "दुनिया के कई हिस्सों में टनलें आम हैं. कई शहरों में इस तरह की परियोजनाएँ पहले से मौजूद हैं."
उन्होंने कहा, "अगर बेंगलुरु की बात करें, तो यहाँ भी पहले से टनलें बनी हुई हैं. उदाहरण के लिए, बेंगलुरु मेट्रो की कई लाइनें टनल वाले हिस्सों से होकर गुज़रती हैं."
प्रोफ़ेसर मुद्दु के अनुसार, "ज़मीन के नीचे टनल बनाना अच्छा विकल्प है. इससे ऊपर की सड़कों पर ट्रैफ़िक जाम कम हो सकता है और सतह पर ज़्यादा जगह उपलब्ध रहती है."
उन्होंने कहा, "जहाँ तक चट्टानों की सुरक्षा का सवाल है, मुझे कोई समस्या नज़र नहीं आती. आम तौर पर टनल बनाने को लेकर ऐसी चिंता नहीं की जाती."
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, "मान लीजिए मैं एक टनल बना रहा हूँ और भूजल का बहाव टनल की दिशा के आड़े हो रहा है. ऐसी स्थिति में पानी दूसरा रास्ता तलाश कर आगे बढ़ जाएगा."
उन्होंने कहा, "दुनिया के कई हिस्सों में मकानों और दूसरी इमारतों के नीचे भी सुविधाएँ बनाई जाती हैं. इनका इस्तेमाल प्राकृतिक आपदाओं जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए किया जाता है."
उन्होंने कहा, "अगर पानी का इस्तेमाल कम हो रहा हो, तब भी इससे कोई समस्या पैदा नहीं होती."
प्रोफ़ेसर मुद्दु के अनुसार, "बेंगलुरु बहुत मज़बूत और कठोर ग्रेनाइट चट्टानों पर बसा है. ये चट्टानें बहुत पुरानी हैं. टनल बनाने से इन पर किसी तरह का असर नहीं पड़ेगा."
उन्होंने कहा, "टनल चट्टान की ऊपरी सतह पर नहीं बनाई जाती. इसे काफ़ी गहराई में बनाया जाता है. बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (बीएमआरसीएल) को इस तरह की परियोजनाओं का लंबा अनुभव है."
उन्होंने कहा, "चट्टानों की सुरक्षा को लेकर मुझे कोई समस्या नहीं दिखती."
प्रोफ़ेसर मुद्दु ने कहा, "हमें यह समझना होगा कि अगर टनल बनने से भूजल किसी दूसरी दिशा में बहने लगे, तो हो सकता है कि उसका फ़ायदा आपको न मिले."
उन्होंने कहा, "इसलिए भूजल के बहाव की दिशा का अध्ययन करना ज़रूरी है. हम इसके लिए मॉडलिंग सिमुलेशन कर सकते हैं. साथ ही संभावित प्रभावों को कम करने की योजना पहले से तैयार रख सकते हैं."
उन्होंने बताया, "बीएमआरसीएल के पास इस विषय पर एक रिपोर्ट भी मौजूद है."
क्या टनल रोड ट्रैफ़िक समस्या का समाधान करेगी?
देश के कई बड़े शहरों की तरह बेंगलुरु भी ट्रैफ़िक की समस्या से जूझ रहा है. लेकिन टिकाऊ परिवहन के मामले में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) की सस्टेनेबल ट्रांसपोर्टेशन लैब के प्रोफ़ेसर आशीष वर्मा टनल रोड परियोजना के विरोध में हैं.
उन्होंने कहा, "सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिवहन का ऐसा साधन हो जो सबसे ज़्यादा लोगों को ले जा सके. साथ ही वह कम जगह घेरे और उसकी लागत भी कम हो."
उन्होंने कहा, "असल सवाल यह है कि एक यात्री को ले जाने में कितना ख़र्च आता है और उसके लिए कितनी जगह की ज़रूरत पड़ती है."
प्रोफ़ेसर वर्मा ने उदाहरण देते हुए कहा, "अगर 40 लोग आराम से एक बस में सफ़र कर सकते हैं, तो यही 40 लोग अगर अपनी-अपनी गाड़ियों से जाएँ, तो सड़क पर कितनी ज़्यादा जगह घिर जाएगी."
उन्होंने कहा, "अगर भूमिगत सड़क टनल और भूमिगत मेट्रो टनल की तुलना करें, तो सड़क के ज़रिए एक यात्री को ले जाने की लागत मेट्रो की तुलना में छह गुना ज़्यादा होती है."
उन्होंने कहा, "जब लोगों को कम लागत में बेहतर तरीके से ले जाया जा सकता है, तो फिर इतना पैसा ख़र्च करने की क्या ज़रूरत है?"
प्रोफ़ेसर वर्मा के अनुसार, "तकनीकी रूप से इस तरह की परियोजनाओं का शहरी परिवहन व्यवस्था में कोई ख़ास महत्व नहीं है. ख़ास तौर पर भारतीय शहरों के संदर्भ में."
उन्होंने अपनी लैब के एक अध्ययन का भी ज़िक्र किया. यह अध्ययन हेब्बल-वेटरिनरी एंड फ़िशरीज़ यूनिवर्सिटी टनल रोड परियोजना पर किया गया था, जिसकी आधारशिला पिछले महीने रखी गई थी.
उन्होंने कहा, "इस तरह की सेपरेटर परियोजनाएँ ट्रैफ़िक जाम को ख़त्म नहीं करतीं. वे सिर्फ़ जाम की जगह बदल देती हैं."
प्रोफ़ेसर वर्मा ने कहा, "भारतीय शहरों और बेंगलुरु के लिए मूल समाधान साझा परिवहन, इलेक्ट्रिक परिवहन और एक्टिव मोबिलिटी हो सकती है."
उन्होंने बताया, "साझा परिवहन का मतलब ऐसे साधनों का इस्तेमाल है जिनमें लोग मिलकर सफ़र करते हैं. इलेक्ट्रिक परिवहन का मतलब स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित परिवहन है."
उन्होंने कहा, "एक्टिव मोबिलिटी का मतलब पैदल चलना और साइकिल चलाना है. इसमें पैदल यात्री और साइकिल सवार शामिल होते हैं."
उन्होंने कहा, "अगर इन तीनों विकल्पों को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए, तो परिवहन व्यवस्था को ज़्यादा टिकाऊ और ऊर्जा के मामले में बेहतर बनाया जा सकता है. समाधान का रहस्य इसी में छिपा है."
प्रोफ़ेसर वर्मा ने कहा, "कई लोग सोचते हैं कि यह कारों के ख़िलाफ़ अभियान है. लेकिन ऐसा नहीं है."
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि लगभग 80 फ़ीसदी यात्राएँ सार्वजनिक परिवहन, पैदल चलने और साइकिल चलाने के ज़रिए होनी चाहिए. बाकी 20 फ़ीसदी लोग कार से सफ़र कर सकते हैं."
उन्होंने कहा, "जब ज़्यादातर लोग सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने लगेंगे, तब सड़कों पर जगह भी ज़्यादा उपलब्ध होगी. इससे कार इस्तेमाल करने वालों को भी बेहतर सुविधा मिलेगी."
मुख्यमंत्री शिवकुमार ने बातचीत के दिए थे संकेत
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पहली बार बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से इस विरोध प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा था, "इस समय काफ़ी आलोचना हो रही है. मेरी सरकार संवाद में विश्वास करती है."
गुरुवार रात को डीके शिवकुमार ने एक्स पर पोस्ट कर इस संशोधन विधेयक को वापस लेने का फ़ैसला किया. उन्होंने लिखा, "हमारी सरकार ने हमेशा कर्नाटक के लोगों की भावनाओं का सम्मान किया है. कर्नाटक पार्क संरक्षण संशोधन विधेयक को वापस लेने का कैबिनेट का फ़ैसला भी लोगों के प्रति इसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है."
"जनता की राय, चिंताओं और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने तय किया है कि वह अपनी मंशा को लोगों के सामने और साफ़ तौर पर रखेगी और ज़रूरी संशोधनों के साथ विधेयक को फिर से पेश करेगी."
"लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी निर्णायक होती है. हमारी सरकार का संकल्प है कि हम ईमानदारी से अपनी मंशा को जनता की अदालत में रखें और लोगों के भरोसे के साथ आगे बढ़ें."
वहीं टनल परियोजना को लेकर डीके शिवकुमार ने बीबीसी हिन्दी से कहा था, "जनहित बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हमें परिवहन की ज़रूरत भी है. लोगों को ग़लत जानकारी दी गई है."
उन्होंने कहा, "मैं राज्य और बेंगलुरु के लोगों को समझाने की कोशिश करूँगा."
शिवकुमार ने कहा, "बेंगलुरु की आबादी लगभग 1.5 करोड़ है. शहर में करीब 1.4 करोड़ वाहन हैं."
उन्होंने कहा, "बेंगलुरु कोई योजनाबद्ध शहर नहीं है. यहाँ इमारतों को तोड़कर नई सड़कें बनाना आसान नहीं है. यही मौजूदा स्थिति है."
उन्होंने कहा था, "मैं बेंगलुरु बिज़नेस कॉरिडोर परियोजना पर काम कर रहा हूँ, जो पूरे शहर के चारों ओर बनाई जा रही है."
उन्होंने कहा, "राज्य के दूसरे शहरों में भी इसी तरह की रिंग रोड परियोजनाएँ शुरू की जा रही हैं. इसका मक़सद ट्रैफ़िक जाम कम करना है."
टनल रोड के इस्तेमाल को लेकर शिवकुमार ने कहा, "जो लोग इस टनल सड़क का इस्तेमाल करेंगे, उन्हें शुल्क देना होगा."
उन्होंने कहा, "समय भी धन है. एक आम आदमी टनल में कैसे जाएगा? वे सभी भी आम लोग ही हैं."
उन्होंने कहा, "इन टनलों में केवल चार पहिया वाहन ही जा सकेंगे. हम दो पहिया वाहनों को वहाँ जाने की अनुमति नहीं दे सकते, क्योंकि दुर्घटना का ख़तरा हो सकता है."
उन्होंने कहा, "दुनिया के कई शहरों में यही व्यवस्था अपनाई जाती है. मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु में भी इसी तरह की प्रणालियाँ मौजूद हैं."
आख़िर 90 साल की उम्र में भी उन्हें इतना दृढ़ क्या बनाता है?
येलप्पा रेड्डी कहते हैं, "यह उम्र का सवाल नहीं है. आपके भीतर एक जुनून होना चाहिए. एक लगन होनी चाहिए."
उन्होंने कहा, "महात्मा गांधी चलते रहे, संघर्ष करते रहे और लड़ते रहे. उन्होंने आख़िरी सांस तक संघर्ष किया."
उन्होंने कहा, "मैं अपनी तुलना महात्मा गांधी से नहीं कर सकता. लेकिन वही भावना मेरे भीतर भी है."
उन्होंने कहा, "मेरे गुरु ने मुझे सिखाया था कि जब तक ज़िंदा हो, संघर्ष करते रहो."
उन्होंने कहा, "बहुत से लोग सोचते हैं कि रिटायर होने के बाद इंसान कुछ नहीं करता. वह मानो एक मृत शरीर बन जाता है."
उन्होंने कहा, "अगर आप यह मान लेते हैं कि रिटायरमेंट के बाद आप एक लाश बन चुके हैं, तो सचमुच आप जीवित रहते हुए भी मृत समान हैं."
उन्होंने कहा, "मैं चाहता था कि जीवन के आख़िरी दिन तक इसी तरह सक्रिय रहूँ और काम करता रहूँ."
हालाँकि इस पूरे विवाद में शामिल सभी पक्षों के संकल्प की असली परीक्षा आगे होगी.
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इन चुनावों के नतीजे यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि इस मुद्दे पर जनता किसके साथ खड़ी है और आगे की दिशा क्या होगी?
AI outlook — possibilities, not facts
कर्नाटक सरकार जनता की राय को ध्यान में रखते हुए पार्क संरक्षण विधेयक में आवश्यक संशोधनों के साथ फिर से पेश करेगी।
Very likely · Within weeks
टनल रोड परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव पर वैज्ञानिक बहस जारी रहेगी और इसके लिए अतिरिक्त अध्ययन किए जा सकते हैं।
Likely · Within months
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