
सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से पहले चरित्र और पृष्ठभूमि की जांच के लिए जारी नए दिशा-निर्देशों पर राजनीतिक और छात्र संगठनों ने उठाए सवाल।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों के लिए चरित्र सत्यापन पर नया आदेश जारी किया है। इसमें हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को अयोग्य मानने का प्रावधान है, जिसे विपक्षी दल और छात्र संगठन असंवैधानिक बता रहे हैं।
AI-generated summary
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए चरित्र सत्यापन पर 28 अक्टूबर को एक नया आदेश जारी किया है। यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में पुराने शासनादेशों को संकलित करके बनाया गया है।
किसी भी सरकारी नौकरी में नियुक्ति से पहले एक तय प्रक्रिया होती है. उम्मीदवार परीक्षा पास करते हैं, उनके दस्तावेज़ों और चरित्र का सत्यापन होता है और फिर नियुक्ति पत्र जारी किया जाता है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी प्रक्रिया से जुड़े नियमों को लेकर एक नया आदेश जारी किया है और इसी आदेश के एक प्रावधान को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
सवाल उठते देख सरकार ने सफ़ाई भी जारी की है और कहा है कि मीडिया में इस आदेश की जो व्याख्या की जा रही है, वो भ्रामक है.
तो इस आदेश में ऐसा क्या है और इसके किस प्रावधान को विपक्षी पार्टियां और छात्र संगठन असंवैधानिक बता रहे हैं?
दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार में प्रमुख सचिव एम देवराज ने बीते 28 अक्तूबर को 21 पन्नों का एक आदेश जारी किया.
इसके तहत सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों के चरित्र (कैरैक्टर) और पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) की जांच के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गए थे.
इसी आदेश के पैरा नंबर चार के एक प्रावधान में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसे संगठन का सदस्य है, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीक़ों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है.
सरकार ने आगे जोड़ा है कि व्यक्ति की उम्र 21 साल पूरी होनी चाहिए.
साथ ही उसने सत्यापन (वेरिफ़िकेशन) की तारीख़ से पिछले तीन सालों के भीतर अगर ऐसी किसी गतिविधि में हिस्सा लिया होगा तभी उसके ऊपर इस आदेश के नियम लागू होंगे.
आदेश में ये भी कहा गया है, "अगर इस दौरान उसके व्यवहार में बदलाव के ठोस और सकारात्मक प्रमाण उपलब्ध होते हैं, तो इस धारणा को चुनौती दी जा सकती है."
उत्तर प्रदेश से बीजेपी के राज्यसभा सांसद राम प्रताप सिंह ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि देश में अराजकता फैलाने वालों के प्रति ऐसी ही कार्रवाई होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ''आपको सत्ता परिवर्तन करना है तो आप चुनाव में आइए. चुनाव में आप जीतते हैं तो सत्ता परिवर्तन होगा, लेकिन आप अगर ये चाहें कि गुंडई के बल पर, अराजकता के बल पर सत्ता परिवर्तन करेंगे तो ये होने वाला नहीं है.''
क्या कह रहे हैं विपक्षी दल?
वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार के फ़ैसले पर तंज कसते हुए कहा है कि "जो ऐसे क़ानून बना रहे हैं, वो खुद जल्द बेरोज़गार होने जा रहे हैं."
उनकी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर ने सरकार के फ़ैसले की तुलना अंग्रेज़ी शासन के दौर के नियमों से की है.
उनका कहना है कि "लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है. सत्ता बदलने की मांग करना और व्यवस्था को हिंसा से बदलना एक बात कैसे हो सकती है?"
कांग्रेस नेता आराधना मोना मिश्रा ने भी इस आदेश को "असंवैधानिक" बताया है.
उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरी की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर इस आदेश का असर नहीं पड़ना चाहिए.
उन्होंने कहा, "इस देश का संविधान लोगों को शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखने, विरोध करने और प्रदर्शन करने का अधिकार देता है. इस अधिकार का उल्लंघन करना असंवैधानिक है. अगर कोई भड़काऊ बयान देता है या अशांति फैलाने की कोशिश करता है, तो वह अलग मामला है."
सरकार का यह आदेश ऐसे वक़्त में आया है, जब बीते तीन महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े विरोध-प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं.
इन प्रदर्शनों में स्टूडेंट्स को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए देखा गया है. उनमें से कई पर एफ़आईआर दर्ज होने के मामले भी सामने आए हैं.
ऐसे में कई लोग इस आदेश को विरोध प्रदर्शनों की आवाज़ को दबाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.
आलोचकों का कहना है कि सरकार ऐसे आदेश के ज़रिए युवाओं में ख़ौफ़ पैदा करना चाहती है, उनके मन में ये डर बैठाना चाहती है कि अगर सरकार विरोधी किसी भी प्रदर्शन में शामिल हुए तो सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है.
'शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शन के बीच फ़र्क़ कौन तय करेगा?'
ऐसा मानने वालों में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई कर रही अंजलि भी एक हैं. अंजलि एक स्टूडेंट एक्टिविस्ट भी हैं और दिशा नाम के एक छात्र संगठन से जुड़ी हैं.
वह कहती हैं, ''सरकार ने आदेश में भले ही हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल लोगों को अयोग्य ठहराने की बात कही हो, लेकिन आशंका है कि शांतिपूर्ण आंदोलनों को भी हिंसक बताकर उनमें शामिल लोगों को निशाना बनाया जा सकता है.''
उन्होंने नोएडा में मज़दूरों के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक रूप देकर कार्यकर्ताओं, स्टूडेंट्स और मज़दूरों पर गंभीर क़ानूनी कार्रवाई की गई.
छात्रा के मुताबिक़, यह आदेश असहमति जताने के संवैधानिक अधिकार पर हमला है और युवाओं को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहना चाहिए.
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल) एक राजनीतिक मंच है जो सामाजिक-आर्थिक समानता, शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करता है.
इसके उत्तर प्रदेश महासचिव दिनकर कपूर सरकार के आदेश पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं, ''शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शन के बीच फ़र्क़ कौन तय करेगा?
सरकार किसी भी आंदोलन में शामिल लोगों पर गंभीर धाराओं में मुक़दमे दर्ज कर सकती है और फिर उन्हें हिंसक गतिविधियों में शामिल बताकर नौकरी से वंचित कर सकती है.
यूपी में पेपर लीक, भर्ती में गड़बड़ी और नई भर्तियां न निकलने से युवाओं में नाराज़गी है. सरकार को उनकी आवाज़ सुननी चाहिए, न कि कार्रवाई के ज़रिए उसे दबाने की कोशिश करनी चाहिए.''
"अपराध और असहमति को एक ही तराजू में नहीं तौलें''
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की लखनऊ विश्वविद्यालय इकाई के मंत्री शक्ति सिंह ने कहा कि सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन होना चाहिए, लेकिन इसकी प्रक्रिया निष्पक्ष होनी ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि राजनीतिक विचारधारा, शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए.
अगर किसी अभ्यर्थी के ख़िलाफ़ प्रतिकूल रिपोर्ट आती है, तो उसे अपना पक्ष रखने और निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अवसर मिलना चाहिए.
उनके मुताबिक़, सरकार की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी युवा के साथ अन्याय न हो और उसके वर्षों की मेहनत और भविष्य पर आंच न आए.
वहीं, एबीवीपी की लखनऊ विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष आशुतोष श्रीवास्तव ने कहा कि गंभीर आपराधिक गतिविधियों और हिंसक तरीक़ों से व्यवस्था को चुनौती देने वालों के ख़िलाफ़ स्पष्ट नियम होने चाहिए.
हालांकि, किसी विद्यार्थी की राजनीतिक विचारधारा, वैचारिक असहमति या शांतिपूर्ण आंदोलन को उसके ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "अपराध और असहमति को एक ही तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए."
उनके मुताबिक़, नियमों को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू करना ज़रूरी है, ताकि ग़लत करने वालों पर कार्रवाई हो, लेकिन निर्दोष युवाओं का भविष्य प्रभावित न हो.
सरकार की सफ़ाई
हालांकि आदेश पर उठते सवालों के बीच उत्तर प्रदेश के नियुक्ति विभाग ने 29 अक्तूबर को स्पष्टीकरण जारी कर कहा है कि राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा. इसलिए इस प्रावधान को राजनीतिक विचारों के आधार पर नौकरी से रोकने की व्यवस्था बताना भ्रामक है.
हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल संगठनों का ज़िक्र
सरकार का कहना है, यह प्रावधान उन संगठनों से जुड़ा है जिनका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीक़ों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है. सामान्य राजनीतिक विचार, सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियां इसके दायरे में नहीं आतीं.
प्रावधान पहले से लागू था, नए आदेश में स्पष्ट किया गया
नियुक्ति विभाग का कहना है कि यह नियम पहले के शासनादेश में भी मौजूद था. हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में पुराने प्रावधानों को एक साथ संकलित कर नए आदेश में अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित रूप से रखा गया है, ताकि उनका एकरूप पालन हो सके.
तीन साल की अवधि और व्यवहार में बदलाव के प्रमाण का भी ज़िक्र
नियम के मुताबिक़, 21 साल की उम्र के बाद पिछले तीन वर्षों में ऐसी गतिविधियों में भागीदारी को सक्रिय संलग्नता का प्रमाण माना जा सकता है. हालांकि, इस दौरान व्यक्ति के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण हों, तो उन्हें भी ध्यान में रखने का प्रावधान है.
आदेश की ज़रूरत क्यों पड़ी?
सरकार के मुताबिक़, सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से पहले चरित्र और सत्यापन को लेकर 1958 से 2021 के बीच अलग-अलग शासनादेश जारी किए गए थे.
इन आदेशों में सत्यापन की प्रक्रिया, समय-सीमा और नियुक्ति से जुड़े दिशा-निर्देश तय किए गए थे. अब सरकार ने इन सभी निर्देशों को एक जगह संकलित कर एक समेकित नीति बनाई है, ताकि अलग-अलग विभागों में इनका एक जैसा पालन हो सके.
इस प्रक्रिया में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो मामलों का भी उल्लेख किया गया है.
शैलेन्द्र कुमार बनाम राज्य सरकार और अनिल कुमार यादव बनाम राज्य सरकार के मामलों में हाईकोर्ट ने पुलिस भर्ती के संदर्भ में नई नीति बनाने के निर्देश दिए थे. सरकार ने नए शासनादेश में इन निर्देशों का हवाला देते हुए सत्यापन की प्रक्रिया को नए सिरे से व्यवस्थित किया है.
आदेश में साफ़ कहा गया है कि ये दिशा-निर्देश जारी होने की तारीख़ से प्रभावी होंगे और पहले से लंबित मामलों का निपटारा भी इन्हीं के आधार पर किया जाएगा.
यानी जिन अभ्यर्थियों का चरित्र सत्यापन पहले से चल रहा है, उनके मामलों में भी नए आदेश में तय की गई अपराधों की श्रेणियों, अयोग्यता के नियमों और अपवादों को ध्यान में रखा जाएगा.
AI outlook — possibilities, not facts
इस आदेश के खिलाफ कानूनी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
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