
डूसू चुनाव में एनएसयूआई की हार के बाद कन्हैया कुमार और विनोद जाखड़ के नेतृत्व पर उठ रहे सवाल, दीपांशु शौकीन की बागी जीत ने बढ़ाई मुश्किलें।
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ (डूसू) चुनाव में एनएसयूआई की हार के बाद संगठन के भीतर नेतृत्व और टिकट वितरण पर विवाद गहरा गया है। बागी दीपांशु शौकीन की जीत और कन्हैया कुमार व विनोद जाखड़ के बीच कथित मतभेदों ने संगठन की चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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डूसू चुनाव में एनएसयूआई को हार का सामना करना पड़ा है, जबकि बागी उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है। संगठन के भीतर टिकट वितरण और जातीय समीकरणों को लेकर विवाद चल रहा है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (डूसू) के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के स्टूडेंट्स विंग नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया यानी एनएसयूआई की हार की ज़िम्मेदारी किसकी है?
एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रभारी कन्हैया कुमार की या राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ की?
एनएसयूआई को हार तब मिली है, जब पिछले महीने ही बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ जेन ज़ी का आंदोलन हुआ था और शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. पेपर लीक मामले में कई अभ्यर्थियों की आत्महत्या के मामले भी सामने आए थे. राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' नाम से अभियान चला रहे हैं. ऐसे में एनएसयूआई कहाँ चूक गई?
डूसू के उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के बाग़ी दीपांशु शौकीन की जीत ने इस बहस को और बल दिया है कि संगठन अपने ही लोगों को साथ रखने में नाकाम रहा. दीपांशु को 30 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले जो कि अध्यक्ष पद पर जीते एबीवीपी के यश डबास के 24,576 वोट से भी ज़्यादा हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दीपांशु को एनएसयूआई ने टिकट क्यों नहीं दिया था?
एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने इस सवाल के जवाब में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि उन्होंने दीपांशु को अध्यक्ष पद के लिए टिकट का ऑफर किया था लेकिन वह तैयार नहीं हुए. विनोद जाखड़ कहते हैं, ''दीपांशु उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते थे. मुझे इससे भी कोई दिक़्क़त नहीं थी लेकिन संगठन में इस बात पर सहमति नहीं बन पाई. देखिए, संगठनात्मक स्तर पर कुछ कमी तो रही है. हम लोग उस कमी को सुधारेंगे. जब टिकट वितरण होता है तो कई परिस्थितियां, कई जातिगत समीकरण होते हैं और सब चीज़ों का आकलन करके ही काम लिया जाता है.''
एनएसयूआई के शीर्ष नेतृत्व में शामिल एक शख़्स ने मुझे नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि कन्हैया कुमार को भी दीपांशु को अध्यक्ष पद पर लड़ाने में दिक़्क़त नहीं थी लेकिन वह इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि उन्हें उपाध्यक्ष के लिए ही टिकट दिया जाए. उन्होंने कहा, ''दीपांशु उपाध्यक्ष पद के अलावा कोई और टिकट लेने के लिए तैयार नहीं थे. विनोद जाखड़ को इससे दिक़्क़त भी नहीं थी लेकिन कन्हैया कुमार का कहना था कि संगठन ऐसे काम नहीं करता है. अगर संगठन किसी फ़ैसले पर पहुँच रहा है तो दीपांशु अपनी ज़िद पर नहीं अड़ सकते हैं. ऐसे में दीपांशु को उपाध्यक्ष पद के लिए एनएसयूआई का टिकट नहीं मिला और उन्होंने निर्दलीय मैदान में जाने का फ़ैसला किया.''
इस मामले में कन्हैया कुमार ने कुछ भी नहीं कहा है. चुनाव से ठीक पहले कन्हैया ने एनएसयूआई की जीत का भरोसा ज़रूर जताया था. लेकिन कन्हैया कुमार ने दीपांशु शौकीन को उपाध्यक्ष पद के लिए टिकट क्यों नहीं दिया? एनएसयूआई में कन्हैया कुमार के खेमे के एक पदाधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि "हम मैच फिक्सिंग नहीं चाहते थे." उन्होंने कहा, ''पहले आपको इस सवाल का जवाब खोजना चाहिए कि दीपांशु शौकीन अध्यक्ष पद पर चुनाव के लिए तैयार क्यों नहीं थे? ज़ाहिर है कि एबीवीपी के कैंडिडेट यश डबास को वह चुनौती देने से बच रहे थे. हमें केवल एक सीट नहीं चाहिए थी बल्कि वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध एक छात्र नेता चाहिए था. यश डबास और दीपांशु दोनों जाट हैं. दीपांशु नहीं चाहते थे कि जाट वोट बँटे. दीपांशु ने अध्यक्ष पद पर टिकट लेने से इनकार इसलिए किया क्योंकि उन्हें यश डबास की जीत सुनिश्चित करनी थी और उपाध्यक्ष पद पर ख़ुद की जीत. दीपांशु ने यह सुनिश्चित किया कि अध्यक्ष पद के लिए जाट वोट नहीं बँटे और यश ने यही काम उपाध्यक्ष पद के लिए किया.''
कन्हैया कुमार के खेमे के उस पदाधिकारी ने कहा, ''डूसू के इतिहास में पहली बार अध्यक्ष पद के लिए एक आदिवासी उम्मीदार को हमने टिकट दिया. जिस डूसू में जाटों और गुर्जरों का दबदबा रहता है, वहाँ एक आदिवासी उम्मीदवार को उतारना क्या स्थापित स्टीरियोटाइप को तोड़ने का एक साहसिक क़दम नहीं था? हमने विजय शंकर मीणा को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने एबीवीपी को दमदार चुनौती भी दी. क्या यह कांग्रेस और राहुल गांधी को मज़बूत करने वाला क़दम नहीं है?''
लेकिन दीपांशु शौकीन इस बात से इनकार करते हैं कि उन्हें अध्यक्ष पद के लिए टिकट ऑफर किया गया था. दीपांशु ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''यह बिल्कुल ग़लत नैरेटिव गढ़ा जा रहा है. मुझसे इन्होंने पहले तीनों पदों पर नामांकन कराया. कहा था कि अध्यक्ष पद के लिए टिकट मिलेगा. बाद में विजय शंकर मीणा से भी तीनों पदों पर करा दिया. मुझे लगा कि ये अब मुझे टिकट नहीं देंगे. ऐसे में मैंने अपना नाम अध्यक्ष पद से वापस ले लिया. लेकिन मुझे उपाध्यक्ष के लिए भी टिकट नहीं दिया. मेरी मुलाक़ात तो न कन्हैया कुमार से हुई है और न ही विनोद जाखड़ से. एक अफ़वाह लोग यह भी फैला रहे हैं कि यश डबास से मेरी रिश्तेदारी है. ऐसा बिल्कुल नहीं है. हाँ वो मेरे दोस्त हैं.''
डूसू में एनएसयूआई के एक पूर्व सचिव ने कहा कि उनके नेतृत्व ने इस बार डूसू के चुनाव को कम्युनिटी केंद्रित बना दिया और यह बड़ी रणनीतिक चूक थी. उन्होंने कहा, ''विजय शंकर मीणा को उम्मीदवार बनाना अच्छी बात थी लेकिन उनकी आदिवासी पहचान को उभारना एक रणनीतिक चूक थी. आप अगर डूसू चुनाव को कम्युनिटी के स्तर पर ले जाएंगे तो चुनाव में पार्टी की लाइन मिट जाती है. इस बार के चुनाव में ऐसा ही हुआ. आप फ़ेसबुक पर जाट कम्युनिटी वाले पेज देखें तो क्या अपील की जा रही थी. अध्यक्ष के लिए यश डबास, उपाध्यक्ष के लिए दीपांशु शौकीन और जॉइंट सेक्रेटरी के लिए गोपाल चौधरी को. ये अपील जातीय लाइन पर थी. जाटों के साथ गुर्जर भी हो गए. ऐसे में एनएसयूआई के लिए चुनाव जीतना संभव नहीं रह गया था.''
एनएसयूआई के भीतर यह बात अब कई लोग कह रहे हैं कि अध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रभारी दोनों एक पेज पर नहीं हैं. विनोद जाखड़ से यही सवाल पूछा कि वाक़ई ऐसी स्थिति है? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''नहीं, देखिए, ऐसी कोई बात नहीं है. हम सब एक पन्ने पर ही हैं और मिलकर ही काम कर रहे हैं. ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है. लेकिन कई बार बहुत चीज़ों में सहमति होती है और बहुत चीज़ों में असहमति होती है. यह पॉलिटिक्स का पार्ट है, जो चलता रहता है.''
बीएचयू से जुड़े एनएसयूआई के एक राष्ट्रीय समन्वयक ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, ''दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ कॉलेजों को छोड़ दें तो एनएसयूआई की किसी भी कॉलेज में यूनिट नहीं है. एनएसयूआई के किसी भी प्रदेश की कार्यकारिणी में कन्हैया कुमार शिरकत नहीं करते. कन्हैया कुमार का नंबर और बातचीत के लिए संगठन के लिए काम करने वाले एनओबी तक पहुँच नहीं है. कन्हैया दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव में किसी कॉलेज में नहीं दिखे.''

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