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Backदिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर क्या है विवाद? बेदखली के नोटिस को लेकर अलग-अलग दावे क्यों
दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर क्या है विवाद? बेदखली के नोटिस को लेकर अलग-अलग दावे क्यों
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BBC हिंदी2 hours agoLaw6 min readIndia

दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर क्या है विवाद? बेदखली के नोटिस को लेकर अलग-अलग दावे क्यों

नई दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में स्थित एक मस्जिद को लेकर विवाद गहरा गया है, जहां बिजली-पानी की कटौती और बेदखली के नोटिस को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आ रहे हैं।

Quick Look

नई दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में स्थित 300 साल पुरानी मस्जिद को लेकर विवाद जारी है। मस्जिद की बिजली-पानी की आपूर्ति काट दी गई है और बेदखली के नोटिस को लेकर वक्फ बोर्ड और सरकारी दावों में विरोधाभास है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बिजली बहाली की याचिका खारिज कर दी है।

AI-generated summary

Why It Matters

रेस कोर्स इलाके में झुग्गी बस्तियों को हटाने की कार्रवाई के बाद मस्जिद की स्थिति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है। वक्फ बोर्ड इसे अपनी संपत्ति बताता है, जबकि सरकारी एजेंसियां इसे अतिक्रमण मान रही हैं।

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एक बंद गेट के पीछे निजी सुरक्षाकर्मी, दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के जवान तैनात हैं.

इस गेट से क़रीब तीन सौ मीटर दूर एक मस्जिद, एक मंदिर और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद हाल ही में हटाई गई एक झुग्गी बस्ती है.

गेट के बाहर झुग्गी बस्ती से हटाए गए लोग, पत्रकार और कुछ ऐसे लोग हैं जो भीतर जाना चाहते हैं. इनमें कुछ लोग मस्जिद में नमाज़ पढ़ने भी आते हैं.

लेकिन सुरक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी किसी को भी गेट पार करने की इजाज़त नहीं देते. झुग्गी छोड़कर 45 किलोमीटर दूर दी गई जमीन पर बसने को मजबूर हुईं एक विस्थापित मजदूर महिला ने गेट के पास रोते हुए कहा- "उनका जीवन बर्बाद हो गया है. वहां न कोई सुविधा है और न कमाई का कोई जरिया."

गेट के पास केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) का एक नीले रंग का चेतावनी बोर्ड लगा है.

इस पर लिखा है, "यह भूमि एवं विकास कार्यालय भारत सरकार की संपत्ति है. इस भूमि पर किसी भी प्रकार का अनधिकृत क़ब्ज़ा, अतिक्रमण, निर्माण अथवा अन्य अवैध गतिविधि करना क़ानूनी अपराध है."

हालांकि, मस्जिद की ज़मीन और बोर्ड पर दर्ज सरकारी ज़मीन के बीच संबंध को लेकर विवाद है.

यह सेंट्रल दिल्ली का रेस कोर्स इलाक़ा है. प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास यहां से ज़्यादा दूर नहीं है. इस इलाक़े में आम तौर पर सुरक्षा कड़ी रहती है.

लेकिन मस्जिद तक लोगों की पहुंच पर रोक और बिजली-पानी की सप्लाई काटे जाने के बाद यहां विवाद बढ़ गया.

रेस कोर्स मस्जिद नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) की विरासत इमारतों की सूची में शामिल है. इसे ग्रेड-2 विरासत इमारत के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.

दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के मुताबिक़, यह मस्जिद क़रीब तीन सौ साल पुरानी है और वक़्फ़ संपत्ति के रूप में दर्ज है.

बोर्ड ने अपने पत्रों में 8 सितंबर 1977 को प्रकाशित दिल्ली प्रशासन के आधिकारिक राजपत्र का हवाला दिया है. उसमें 'मस्जिद और क़ब्रिस्तान, रेस कोर्स मैदान' का उल्लेख है.

वक़्फ़ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनवीर अहमद के मुताबिक़, मस्जिद बोर्ड के प्रबंधन और नियंत्रण में है.

तनवीर अहमद ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मस्जिद या वक़्फ़ बोर्ड को कोई अधिकारिक नोटिस नहीं मिला है, मस्जिद परिसर किसी क़ानूनी कार्रवाई का भी हिस्सा नहीं है. हम भूमि एवं विकास कार्यालय से स्थिति को स्पष्ट करने के लिए बात कर रहे हैं. हमने एनडीएमसी और एलएंडडीओ को पत्र भी लिखा है."

हालांकि, मस्जिद को बेदखली का नोटिस दिए जाने के सवाल पर अलग-अलग दावे सामने आए हैं.

वक़्फ़ बोर्ड ने अपने पत्रों में कहा है कि उसे मस्जिद के ख़िलाफ़ कोई औपचारिक बेदखली या ध्वस्तीकरण आदेश प्राप्त नहीं हुआ था.

बोर्ड ने यह भी कहा कि 17 अक्तूबर को कुछ लोग मस्जिद पहुंचे थे, जिन्होंने ख़ुद को भूमि एवं विकास कार्यालय का अधिकारी बताया और इमाम को तीन दिन के भीतर परिसर खाली करने के लिए कहा.

मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून ने भी बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्हें कोई लिखित नोटिस नहीं दिया गया था. उनके मुताबिक़, कुछ अधिकारी आए थे और मस्जिद खाली करने के लिए कहा था.

दूसरी ओर, 21 अक्तूबर को प्रकाशित पीटीआई की एक रिपोर्ट में एनडीएमसी के अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि मस्जिद के प्रबंधन को बेदखली का नोटिस दिया गया था और परिसर खाली करने के लिए छह दिन का समय मिला था.

हालांकि, 23 अक्तूबर को प्रकाशित 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि मस्जिद को बेदखली का नोटिस नहीं भेजा गया था.

यानी नोटिस की स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से सामने आए दावों में अंतर है. बीबीसी भी स्वतंत्र रूप से नोटिस दिए जाने की पुष्टि नहीं कर सका है.

भूमि एवं विकास कार्यालय ने इस मामले पर बीबीसी के सवालों का जवाब रिपोर्ट प्रकाशित होने तक नहीं दिया है.

दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड की ओर से उपलब्ध कराए गए 8 सितंबर 1977 के दिल्ली प्रशासन के राजपत्र में क्रम संख्या 18 पर 'मस्जिद और क़ब्रिस्तान, रेस कोर्स मैदान' का उल्लेख है.

राजपत्र के मुताबिक़, मस्जिद सफ़दरजंग मक़बरे के पीछे स्थित है. इसमें मस्जिद और क़ब्रिस्तान का क्षेत्रफल दो बीघा दर्ज है. इस्तेमाल के उद्देश्य के रूप में इबादत और दफ़न का ज़िक़्र किया गया है.

19 अक्तूबर 2026 को भूमि एवं विकास कार्यालय को लिखे पत्र में वक़्फ़ बोर्ड ने इसी राजपत्र का हवाला देते हुए कहा कि मस्जिद और उससे लगा क़ब्रिस्तान वक़्फ़ संपत्ति हैं और उनका प्रबंधन बोर्ड के पास है.

बोर्ड के मुताबिक़, उसके नियुक्त इमाम मोहम्मद हारून मस्जिद में पांच वक़्त की नमाज़ कराते हैं.

मस्जिद का एनडीएमसी की विरासत सूची में शामिल होना भी इस विवाद का एक अहम पहलू है. हालांकि, विरासत सूची में दर्ज होने और ज़मीन के स्वामित्व या क़ब्ज़े के अधिकार से जुड़े सवाल अलग हैं.

दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड ने 8 अक्तूबर 2026 को एनडीएमसी के कार्यकारी अभियंता को पत्र लिखकर मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने का अनुरोध किया था.

पत्र में कहा गया कि दोनों सेवाएं 7 अक्तूबर को काट दी गई थीं और ऐसा करने से पहले कोई नोटिस नहीं दिया गया था. बोर्ड ने यह भी कहा कि मस्जिद में बिजली का कनेक्शन 1976 से था और पानी की आपूर्ति 2008 से उपलब्ध थी.

19 अक्तूबर को बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनवीर अहमद ने भूमि एवं विकास कार्यालय को भी पत्र लिखा.

इसमें मस्जिद की बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने और परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया.

बोर्ड के पत्र के मुताबिक़, इमाम ने उसे बताया था कि 17 अक्तूबर को कुछ लोग मस्जिद पहुंचे थे. उन्होंने ख़ुद को भूमि एवं विकास कार्यालय का अधिकारी बताया और तीन दिन में परिसर खाली करने को कहा.

बोर्ड के अनुसार, उन लोगों ने कथित तौर पर यह भी कहा कि इसके बाद मस्जिद को हटा दिया जाएगा. ये दावे वक़्फ़ बोर्ड के पत्र और इमाम के बयान पर आधारित हैं.

इमाम को निर्देश देने वाले लोग कौन थे, इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी.

एनडीएमसी ने 15 अक्तूबर को बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने से इनकार किया था.

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक़, परिषद ने इलाके में तोड़फोड़ की कार्रवाई जारी होने और संभावित नुकसान का हवाला दिया था.

मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून ने बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने की मांग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का रुख़ किया था.

15 अक्तूबर 2026 को न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी.

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के संपत्ति पर अधिकार और यह सवाल कि मस्जिद 25 अगस्त के फ़ैसले के दायरे में आती है या नहीं, गंभीर तथ्यात्मक विवाद हैं.

अदालत ने कहा कि इन सवालों का फ़ैसला इस याचिका में नहीं किया जा सकता.

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि वक़्फ़ बोर्ड, जिसे परिसर का मूल कब्ज़ाधारी बताया गया, ने बिजली-पानी काटे जाने के ख़िलाफ़ याचिका दायर नहीं की थी.

अदालत के मुताबिक़, बोर्ड की ओर से नियुक्त इमाम के पास परिसर पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था, जिसके आधार पर वह बिजली-पानी काटे जाने को अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बता सकें.

अदालत का यह आदेश मस्जिद के वक़्फ़ संपत्ति के दर्जे को लेकर नहीं है.

याचिका बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने से संबंधित थी और अदालत ने उसमें उठे संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा नहीं किया.

रेस कोर्स इलाक़े में झुग्गी बस्तियों को हटाने की कार्रवाई भैराम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कॉलोनी के निवासियों से जुड़े मामले का हिस्सा थी.

भूमि एवं विकास कार्यालय ने 29 अक्तूबर 2025 को पात्र निवासियों के पुनर्वास से संबंधित नोटिस जारी किया था.

इसमें जनवरी 2024 में भूमि एवं विकास कार्यालय और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की ओर से किए गए संयुक्त सर्वे का हवाला दिया गया था.

नोटिस के मुताबिक़, पुनर्वास के लिए पात्र पाए गए परिवारों को सावदा घेवरा स्थित दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डूसिब) की कॉलोनी में आवास आवंटित किए गए थे.

उन्हें मौजूदा परिसर खाली करके आवंटित आवास में जाने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था.

दिल्ली हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2026 को इन तीन झुग्गी बस्तियों के निवासियों से जुड़े मामलों में फ़ैसला सुनाया.

अदालत ने पात्र निवासियों को छह सप्ताह के भीतर सावदा घेवरा में आवंटित आवासों में बसाने और उसके बाद संबंधित ज़मीन खाली कराने के निर्देश दिए.

पुनर्वास की निगरानी के लिए एक समिति गठित करने का आदेश भी दिया गया था.

7 अक्तूबर को झुग्गी बस्तियों को हटाने की कार्रवाई की गई. दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने यहां से हटाए गए अधिकतर पात्र परिवारों का पुनर्वास सावदा घेवरा में किया है.

25 अगस्त के फ़ैसले में रेस कोर्स मस्जिद या क़ब्रिस्तान का स्पष्ट उल्लेख नहीं था.

हालांकि, 15 अक्तूबर को बिजली-पानी की आपूर्ति से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि मस्जिद का परिसर उस फ़ैसले के दायरे में आता है या नहीं.

इस सवाल पर अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है.

मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून के मुताबिक़, झुग्गी बस्तियों को हटाने की कार्रवाई के दौरान मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई थी.

पास में स्थित एक मंदिर के पुजारी केशव राज शास्त्री ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मंदिर 1982 से है, मंदिर की भी बिजली-पानी काट दी गई है. कोई पूजा करने नहीं आ रहा है. हम अपने परिवार के साथ यहां रहते हैं. हमें गेट से अंदर जाने दिया जा रहा है."

फिलहाल मस्जिद तक लोगों की पहुंच सीमित है. इमाम और उनका परिवार परिसर में रह रहे हैं, जबकि बाहरी नमाज़ियों को मस्जिद तक नहीं जाने दिया जा रहा है.

पिछले क़रीब बीस साल से मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आने वाले एक व्यक्ति ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उन्होंने सोमवार तक वहां नमाज़ पढ़ी थी.

उनके मुताबिक़, आसपास के दफ़्तरों में काम करने वाले लोग भी मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आते थे.

मोहम्मद एजाज़ नाम के एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि उन्होंने बीते शुक्रवार को मस्जिद में नमाज़ पढ़ी थी, लेकिन अब उन्हें भीतर जाने नहीं दिया जा रहा है.

इस शुक्रवार (23 अक्तूबर) को कुछ नमाज़ियों को मस्जिद में जाने दिया गया था. हालांकि, बाद में गेट फिर बंद कर दिया गया और दूसरे लोगों को अंदर जाने से रोक दिया गया.

वक़्फ़ बोर्ड ने 1977 के राजपत्र और एनडीएमसी की विरासत सूची का हवाला देते हुए मस्जिद पर अपने प्रबंधन के अधिकार का दावा किया है.

वहीं, भूमि एवं विकास कार्यालय की ओर से इस विवाद पर सार्वजनिक रूप से विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है.

15 अक्तूबर को हाई कोर्ट ने बिजली-पानी बहाल करने की याचिका ख़ारिज की थी, लेकिन संपत्ति के अधिकार और 25 अगस्त के आदेश के दायरे से जुड़े सवालों का अंतिम निपटारा नहीं किया था.

मुसलमानों के मुद्दों पर काम करने वाले संगठन जमियत उलेमा-ए-हिंद ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू से मुलाक़ात कर मस्जिद के मामले में दख़ल देने की अपील की.

वहीं, एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेता चंद्रशेखर ने भी केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से मस्जिद के मामले में दख़ल देने की अपील की है.

वहीं, जमीयत के लिए वक़्फ़ से जुड़े मामले देखने वाले इनामुर रहमान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मस्जिद को लेकर स्थिति को तुरंत स्पष्ट किया जाना चाहिए. जमीयत मस्जिद को बचाने की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है."

वहीं अधिवक्ता महमूद प्राचा इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "नोटिस को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, वक़्फ़ बोर्ड खुलकर मस्जिद के लिए आगे नहीं आ रहा है. कहीं ऐसा ना हो कि चुपके से इस मस्जिद को भी गिरा दिया जाए."

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • मस्जिद के स्वामित्व और बेदखली नोटिस पर कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।

    Very likely · Within months

Open Questions

  • क्या मस्जिद को आधिकारिक बेदखली नोटिस जारी किया गया था?
  • मस्जिद के भविष्य को लेकर सरकार की अंतिम योजना क्या है?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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