
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों की पिटाई, महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ज़ब्ती के आरोपों पर संज्ञान लिया।
दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने आरोपों को गंभीर माना और पुलिस को जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।
AI-generated summary
दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन स्थलों की वैधता को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है।
दिल्ली में हाल के प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान पुलिस पर प्रदर्शनकारियों की पिटाई, पुलिस स्टेशन में एक वकील के साथ मारपीट, महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न और पत्रकारों के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ज़ब्त किए जाने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए।
इसके अलावा जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफ़ाई किए जाने और अदालतों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों का मुद्दा भी उठा।
सीनियर एडवोकेट रामकृष्णन ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को बुरी तरह पीटा गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा, "लोगों को बुरी तरह पीटा गया। यह अब भी जारी है। हिरासत में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती।"
सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने अलग से आरोप लगाया कि एक वकील के साथ पुलिस स्टेशन के अंदर मारपीट की गई। उन्होंने कहा, "वकील को पुलिस स्टेशन में पीटा गया। उनका सिर फट गया और ख़ून बह रहा था।" उन्होंने यह भी कहा कि एक पेन ड्राइव में कथित मारपीट की फुटेज मौजूद है।
रामकृष्णन ने प्रदर्शन के दौरान वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को कथित तौर पर भेजी गई पांच शिकायतों पर भी जवाब मांगा। उन्होंने कहा, "वे शिकायतें रिकॉर्ड में हैं।" उनका कहना था कि ये ईमेल डीसीपी, एसएचओ और एसीपी को भेजे गए थे। इनमें देर रात भेजे गए ईमेल भी शामिल हैं।
महिला पत्रकारों के साथ यौन हिंसा के आरोप से जुड़ी एक याचिका में पेश हुईं सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा कि प्रदर्शन स्थलों से रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकारों को ख़ास तरह के ख़तरों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा, "जब वे किसी प्रदर्शन स्थल पर जाती हैं, तो वे अपने आप में एक अलग वर्ग होती हैं क्योंकि उनके पास सिर्फ़ बोलने और प्रदर्शन करने का अधिकार ही नहीं, बल्कि काम करने का अधिकार भी है।"
जयसिंह ने आरोप लगाया कि महिला पत्रकारों का यौन उत्पीड़न किया गया और "उन्हें धक्का दिया गया और खींचा गया, ख़ासकर पुरुष पुलिस अधिकारियों ने।"
स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए उन्होंने कहा, "मैं पुलिस जांच नहीं चाहती। वे अपनी ही जांच नहीं कर सकते। वे अपने ही मामले में जज नहीं हो सकते।"
उन्होंने महिलाओं की एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें एक रिटायर्ड जज और एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी शामिल हों। उन्होंने शिकायत करने वाली महिलाओं के नाम सीलबंद लिफ़ाफ़े में देने की इजाज़त भी मांगी। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि उनकी संवेदनशील स्थिति को "बहुत संवेदनशीलता और सावधानी" से संभालना होगा।
जयसिंह ने आगे आरोप लगाया कि एक महिला पत्रकार की छेड़छाड़ की शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई, जबकि संबंधित पुलिस अधिकारी ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) क़ानून के तहत दिल्ली हाई कोर्ट का रुख़ किया।
उन्होंने कोर्ट से कहा, "मैं एक ऐसी महिला का प्रतिनिधित्व कर रही हूं, जिसके साथ बहुत बुरी तरह छेड़छाड़ की गई। वह एफ़आईआर दर्ज कराने पुलिस स्टेशन गईं। कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई।"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एफ़आईआर से सभी को एक साथ सुरक्षा देने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को जवाब देने का मौक़ा मिलना चाहिए। चीफ़ जस्टिस ने उन्हें जांच जल्द पूरी करने का निर्देश देते हुए कहा, "आरोप बेहद गंभीर है। क़ानून के मुताबिक़ जो भी नतीजे हों, वे सामने आने चाहिए।"
मेहता ने जवाब दिया, "हम एक हफ़्ते में ऐसा करेंगे।"
जब मेहता ने कहा कि इस बीच पत्रकार को गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा, तो जयसिंह ने आपत्ति जताते हुए कहा, "नहीं! हम आपके साथ सहयोग नहीं करेंगे।"
इसके बाद बेंच ने संबंधित महिला पत्रकार को किसी भी ज़बरदस्ती की कार्रवाई से सुरक्षा देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ़ किया कि यह सुरक्षा सभी महिला पत्रकारों पर सामान्य रूप से लागू नहीं होगी।
सीनियर एडवोकेट मुक्ता गुप्ता ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफ़ाई किए जाने को चुनौती दी। उन्होंने कहा, "किसी नागरिक के प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकार को दबाया नहीं जा सकता।"
सुप्रीम कोर्ट के मज़दूर किसान शक्ति संगठन मामले के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "नई दिल्ली सिर्फ़ कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं है।"
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि एक कमेटी ने इस मुद्दे की जांच करके अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। कोर्ट ने इस चुनौती पर नोटिस जारी किया।
दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सी. यू. सिंह ने आरोप लगाया कि पत्रकारों के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ज़ब्त किए गए हैं।
उन्होंने कहा, "इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस क्यों ज़ब्त किए जा रहे हैं? उनकी रोज़ी-रोटी उन पर निर्भर है। उनका काम उन पर निर्भर है। उनकी सामग्री उन डिवाइस में है। वे डिवाइस उन्हें वापस किए जाने चाहिए।"
मेहता ने इस आरोप से इनकार करते हुए कहा, "कोई डिवाइस ज़ब्त नहीं किया गया है।" कोर्ट ने इस याचिका पर नोटिस जारी किया।
वहीं, सीनियर एडवोकेट गौरव भाटिया ने अदालतों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की मांग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रदर्शन को "पूरी तरह अस्वीकार्य" बताया।
उन्होंने कहा कि क़रीब 200 वकीलों ने एक ज्ञापन पर दस्तख़त किए हैं, जिसमें "न्यायपालिका पर दबाव बनाने" को लेकर चिंता जताई गई है।
इस पर चीफ़ जस्टिस ने कहा, "कोई भी न्यायपालिका पर दबाव नहीं बना सकता।"
उन्होंने साफ़ किया कि कोर्ट फ़िलहाल अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रहा है। चीफ़ जस्टिस ने कहा, "आज कोई अवमानना की कार्यवाही नहीं। हम सिर्फ़ नोटिस जारी कर रहे हैं। पहले देखते हैं कि जवाब क्या आता है, फिर हम इसे आगे बढ़ाएंगे।"
AI outlook — possibilities, not facts
सॉलिसिटर जनरल एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट पेश करेंगे।
Very likely · Within weeks
The Bombay High Court has ruled that its ban on bursting firecrackers on public roads and streets will apply year-round for all festivals. The court cited concerns over toxic air and noise pollution, ordering local authorities to enforce the ban and raise awareness.
The Supreme Court of India has issued notices to the Centre and Delhi Police regarding a plea to hold protest organizers financially liable for damages. The court is also reviewing petitions on designated protest sites and alleged voter roll irregularities.
The Supreme Court ruled that police cannot direct social media platforms under the IT Act to share an accused's digital footprints for periods preceding the crime under investigation, emphasizing proportionality and privacy rights, while quashing a Ghaziabad Police order targeting journalist Abhishek Upadhyay and directing the return of his seized vehicle.
Delhi Metro Rail Corporation announced the reopening of all metro stations after temporary entry/exit restrictions were imposed on certain stations during protests, confirming that 272 trains operated on Oct 10 with 32 lakh commuters, and that full operations resumed after 10 pm, with key interchange stations maintaining line connectivity despite regulated access.
The Supreme Court directed Delhi Police to depute a senior officer to respond to allegations of sexual harassment of women journalists during the Oct 10 protest, while also hearing petitions on contempt of court, police excesses, and political activity inside court premises.
The Supreme Court Bar Association decided to file a contempt petition against Kerala Congress for a deleted social media post asking CJI Surya Kant to quit, while Mamata TMC MP Mahua Moitra's sarcastic misspelling of the CJI's name drew condemnation from SCBA, SCAORA, and SC Women Lawyers Association.