दिवाली: उत्तर भारत में वेज, तमिलनाडु में नॉन-वेज, कैसे अलग हुई परंपरा?
तमिलनाडु में दिवाली के दिन सुबह मटन करी खाने की परंपरा है, जो उत्तर भारत के त्योहार से अलग कैसे हुई, इसे लेकर शोधकर्ताओं की राय।
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तमिलनाडु में दिवाली के दिन मटन या चिकन करी खाने की परंपरा है। उत्तर भारत के विपरीत दक्षिण भारत में इस त्योहार के साथ मांसाहारी भोजन और स्थानीय संस्कृति के जुड़े होने के कारणों पर शोधकर्ताओं और शेफ की राय।
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Why It Matters
तमिलनाडु में दीपावली के दिन मांसाहारी भोजन खाने की एक अनोखी और पुरानी परंपरा है, जो उत्तर भारत के त्योहार के स्वरूप से भिन्न है।
दिवाली के दिन सुबह मटन करी खाने की परंपरा तमिलनाडु के कई इलाक़ों में है. हालांकि दिवाली को उत्तर भारत का त्योहार माना जाता है, लेकिन समय के साथ यह दक्षिण भारत में मनाया जाने लगा है.
आज यह वहां भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार बन चुका है. ऐसे में तमिलनाडु में दिवाली पर मटन करी खाने की परंपरा कैसे शुरू हुई, यह अपने आप में दिलचस्प बात है.
तमिलनाडु में दिवाली के दिन सुबह इडली के साथ मटन या चिकन करी बनाकर खाने की परंपरा भी है. कुछ घरों में दोपहर के भोजन में भी मटन वाले चावल का विशेष भोज भी किया जाता है.
प्रदेश के कई इलाक़ों में यह परंपरा निभाई जाती है. इसी वजह से दीपावली के दिन बकरे और चिकन की क़ीमत काफ़ी बढ़ जाती है.
कुछ गांवों में एक और परंपरा भी है. रिश्तेदार और परिवार के लोग मिलकर एक बकरा ख़रीदते हैं. फिर उसके मांस को आपस में बांट लेते हैं. इसे 'पंगु गोश्त' यानी 'मांस साझा करने' की परंपरा माना जाता है.
दिवाली की तीन कहानियां सबसे प्रसिद्ध
दिवाली का त्योहार मनाने के बारे में कई तरह की कहानियां बताई जाती हैं. इनमें से तीन कहानियां सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध हैं.
पहली कहानी रामायण से जुड़ी है. इसके अनुसार, श्रीराम 14 साल का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे. कहा जाता है कि उस दिन लोगों ने उनके स्वागत में दीपों की पंक्तियां जलाकर उत्सव मनाया था. उसी दिन को दिवाली के रूप में मनाया जाता है.
दूसरी कहानी के अनुसार, यह वह दिन है जब भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था. कहा जाता है कि इस ख़ुशी में लोग पटाखे जलाते हैं, दीपक जलाते हैं और मिठाइयां बांटकर उत्सव मनाते हैं.
तीसरी कहानी जैन धर्म से जुड़ी है. इसके अनुसार, जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर को जिस दिन मोक्ष प्राप्त हुआ था, उस दिन जैन धर्म के अनुयायी उनकी महिमा का सम्मान करने के लिए दीप जलाकर पूजा करते हैं.
लेकिन सांस्कृतिक शोधकर्ताओं का मानना है कि तमिलनाडु में मनाई जाने वाली दिवाली के पीछे ये कहानियां नहीं हैं.
कपिलर को मांस-भोज देने वाला राजा
डॉ. थो. परमशिवन ने अपनी पुस्तक अऱियप्पडाथा तमिऴगम में लिखा है कि दीपावली तमिलनाडु की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और स्थानीय मौसम से जुड़ा हुआ त्योहार नहीं है.
वे लिखते हैं, "यह याद रखना चाहिए कि दिवाली से जुड़े पटाखे और उनका मुख्य घटक बारूद 15वीं सदी तक तमिलनाडु में परिचित नहीं थे. नरकासुर नामक असुर के कृष्ण द्वारा वध की जो दिवाली कथा बताई जाती है, उसका तमिल संस्कृति से कोई संबंध नहीं है. बल्कि यह बाद के समय में ब्राह्मणवादी धार्मिक परंपरा के तहत उभरी कहानी है. 15वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के तमिलनाडु में आने के बाद ही दिवाली यहां एक त्योहार के रूप में मनाई जाने लगी."
तमिलनाडु से मूल रूप से जुड़े नहीं माने जाने वाले इस त्योहार में मांस-भोज की परंपरा कैसे शामिल हुई, इस सवाल के साथ बीबीसी न्यूज़ ने लोक परंपराओं के शोधकर्ता आ. शिवसुब्रमण्यम से बात की.
उन्होंने बताया कि संगम साहित्य के दौर से ही मांसाहारी भोजन उत्सवों और दावतों का एक हिस्सा रहा है.
'मटन-चावल परोसना गौरव की बात'
"पुलाल" यानी मांसाहारी भोजन या अंडा-मंस वाला खाना. आज कुछ समाजों में इसे शाकाहारी भोजन के विपरीत और उससे कम दर्जे का भोजन माना जाता है. लेकिन 'संगम साहित्य' के समय से ही उत्सव और दावतों में मांसाहारी भोजन परोसने की परंपरा रही है. 'संगम साहित्य' को 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच माना जाता है. पुरनानूरु की एक कविता में मांसाहारी दावत की विशेषता का ज़िक्र मिलता है.
लोक परंपरा के शोधकर्ता आ. शिवसुब्रमण्यम कहते हैं कि इंद्रियों को वश में रखने वाले ब्राह्मण के रूप में प्रशंसा पाने वाले कवि कपिलर के हाथ इतने मुलायम क्यों हैं, यह सवाल राजा चेरमान सेल्वक कंडुको वाज़ियाधन ने उनसे पूछा था.
इसके जवाब में कपिलर कहते हैं कि राजा की ओर से दिए जाने वाले मांस मिले करी-चावल के भोज को खाने के अलावा उनके हाथ कोई दूसरा काम नहीं करते. इसी वजह से उनके हाथ मुलायम हैं. इस विषय पर एक कविता भी मिलती है.
"पुलवु नात्रत्त पैंदडी पू नात्रत्त पुगै कोळीई ऊन तुवै कऱिसोरु उंडु वरुंदु तोज़िल अल्लदु पिरिदु तोज़िल अरिया आगलिन नंदुम..."
यह वही कविता है.
आ. शिवसुब्रमण्यम बताते हैं कि तमिलनाडु में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि मांसाहारी भोजन को विशेष दावत का भोजन माना जाता है.
मेहमानों को सम्मानपूर्वक दावत देने के लिए मांस मिलाकर भोजन परोसना गौरव की बात समझी जाती रही है.
'संगम साहित्य में दिवाली शब्द का कोई ज़िक्र नहीं'
आ. शिवसुब्रमण्यम के अनुसार, "एक समय था जब चावल का भोजन खाना बहुत दुर्लभ माना जाता था. बच्चों के खेलों में भी चावल पकाने का खेल शामिल हुआ करता था. इसलिए, भले ही दिवाली हमारे भूगोल और स्थानीय परंपराओं से सीधे जुड़ा हुआ त्योहार नहीं थी, लेकिन इसके उत्सव के भोजन के रूप में मांसाहारी खाना शामिल हो गया।"
"मांसाहारी भोजन को लंबे समय से विशेष भोजन का दर्जा मिला हुआ है. इसी वजह से त्योहार के दिन परिवार और रिश्तेदारों के साथ खाने के लिए मांस वाले चावल का भोजन बनाने की परंपरा चली आ रही है।"
शोधकर्ता शिवसुब्रमण्यम बताते हैं कि आज भी युवाओं के बीच किसी खुशी के मौके या उत्सव के दौरान मांस वाले चावल की दावत देना सम्मान और गर्व की बात माना जाता है.
"इसके पीछे कोई और विशेष कारण नहीं है. मांसाहारी भोजन को बेहतर और ऊंचे दर्जे का भोजन मानने की सोच की वजह से ही मांस की दावत और मांस वाले चावल को विशेष महत्व मिला है।"
वे यह भी बताते हैं कि संगम साहित्य में दिवाली शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता. उनका कहना है कि 15वीं सदी के बाद ही यह त्योहार तमिलनाडु में व्यापक रूप से मनाया जाने लगा.
उनका मानना है कि किसी विशेष कारण के बिना भी, त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण भोजन के रूप में मांसाहारी भोजन अपनी जगह बना चुका है.
'लोकगीतों में मांस वाले चावल का ज़िक्र'
इसके बाद बीबीसी न्यूज़ ने चेन्नई के एमजीआर जानकी कॉलेज के तमिल विभाग की सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. के. सत्यप्रिय्या से बात की. वह लंबे समय से लोकगीतों पर शोध कर रही हैं. उनका कहना है कि दिवाली से जुड़े लोकगीतों में मटन और चावल की दावत का भी ज़िक्र मिलता है.
सत्यप्रिय्या बताती हैं, "थेनी जिले के आंदीपट्टी में जब मैं लोकगीतों को रिकॉर्ड कर रही थी, तब मुझे पता चला कि गांव की महिलाएं आज भी दिवाली से जुड़ा एक गीत याद रखती हैं."
वे कहती हैं, "उस गीत में एक मां गाती है कि उसके पास अपनी बेटी को दिवाली पर नए कपड़े देने और मांस वाले चावल का भोज कराने के लिए पैसे नहीं हैं।"
"इसके जवाब में गीत गाने वाली बेटी कहती है कि मां, चाहे क़र्ज़ लेकर ही सही, मुझे दिवाली पर बुलाओ, रस्म के अनुसार उपहार दो और मांस वाले चावल का भोज कराओ. इसी तरह यह गीत समाप्त होता है।"
सत्यप्रिय्या ने बताया कि ऐसे और भी लोकगीत हैं. इन गीतों में दिवाली के दिन तेल लगाकर स्नान करने और उसके बाद मांस वाले चावल खाने की परंपरा का भी ज़िक्र मिलता है.
सत्यप्रिय्या का मानना है कि नरकासुर की मृत्यु के दिन के रूप में दिवाली को देखने की परंपरा के कारण, मृतकों को सम्मान देने के तौर पर तेल लगाकर स्नान करने और फिर मांस वाले चावल खाने की प्रथा है.
वह यह भी बताती हैं कि एक पुरानी कहावत आज भी प्रचलन में है, "रात भर दिवाली और सुबह होते ही अमावस्या।"
सत्यप्रिय्या कहती हैं, "इसका मतलब यह है कि दिवाली के दिन लोग मांस वाले चावल खाते थे और पूरी रात त्योहार मनाते थे. इसके बाद अगले दिन व्रत रखा जाता था. अमावस्या की शाम को मिठाइयां खाई जाती थीं. इसी वजह से यह कहावत कही जाती है।"
वह आगे बताती हैं कि कई गांवों में दिवाली का मतलब सिर्फ़ दावत करना और पटाखे फोड़ना नहीं होता.
उनका कहना है, "उस रात नरकासुर वध पर आधारित लोक नाटक भी आयोजित किए जाते हैं।"
गांवों में मनाई जाने वाली दिवाली के बारे में सत्यप्रिय्या ने बताया कि वहां इस त्योहार से जुड़ी कई सांस्कृतिक परंपराएं आज भी देखने को मिलती हैं.
आमतौर पर युद्ध में जीत के बाद सैनिकों का सम्मान करने के लिए मांसाहारी भोजन और मदिरा को दावत के रूप में परोसने की परंपरा का ज़िक्र पुरप्पोरुल वेण्या मलाई में मिलता है.
सत्यप्रिय्या बताती हैं कि वहां 'उंडाट्टु' शब्द का इस्तेमाल किया गया है.
उनके अनुसार, युद्ध में मिली जीत का जश्न मनाने के लिए मांसाहारी भोजन और कच्ची शराब देकर उत्सव मनाने को 'उंडाट्टु' कहा जाता था.
सत्यप्रिय्या कहती हैं कि यह भोजन सिर्फ़ वीर सैनिकों को ही नहीं दिया जाता था. कवियों और सहायता मांगने आने वाले लोगों को भी यही भोजन परोसा जाता था.
इसी वजह से उनका मानना है कि मांसाहारी भोजन को उत्सव और जश्न के भोजन के रूप में देखा जाता रहा है.
यही कारण है कि दीपावली के दिन भी इसे विशेष भोजन के तौर पर खाया जाता है.
दिवाली की मटन क़री में क्या ख़ास होता है?
लोकप्रिय शेफ दामू का मानना है कि शुरुआत में दिवाली के मौक़े पर मांस वाले चावल की परंपरा मुख्य रूप से 'मटन पाया' बनाने से जुड़ी थी. बाद में मटन क़री बनाने की परंपरा ज़्यादा प्रचलित हो गई.
वे कहते हैं, "दिवाली से एक रात पहले ही खाना बनाना शुरू हो जाता था. मटन पाया बनाने के लिए लकड़ी के चूल्हे पर आग जलाकर बर्तन में बकरे के पैरों के टुकड़ों को पकने के लिए रख दिया जाता था।"
"अगली सुबह तक वो अच्छी तरह पक जाते थे. फिर उनमें नारियल का दूध और काली मिर्च डालकर पाया तैयार किया जाता था. इसके साथ आमतौर पर इडली या इडियप्पम बनाया जाता था।"
"सुबह का खाना बन जाने के बाद उसी क़री को दोपहर के भोजन में भी खाया जाता था. हाल के वर्षों में पाया की जगह मटन क़री बनाने का चलन बढ़ गया है।"
दामू बताते हैं कि कुछ घरों में चिकन भी बनाया जाता है, लेकिन बकरे का मांस ही मुख्य रूप से पकाया जाता है.
वे यह भी कहते हैं कि जिन घरों में शाकाहारी भोजन बनाया जाता है, वहां भी सुबह के समय वडा क़री, सब्ज़ियों का कुरमा और दोपहर में पकोड़ा क़री जैसी ग्रेवी वाली चीज़ें बनाने की परंपरा है.
"दिवाली के दिन लोग बहुत सारी मिठाई खाते हैं. इसलिए कुछ घरों में लाल मिर्च कम डाली जाती है और उसकी जगह काली मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है।"
"कुछ लोग सिर्फ़ दिवाली के दिन क़री के लिए पीसे जाने वाले नारियल के साथ काजू भी पीसते हैं. इससे क़री का स्वाद और गाढ़ापन बढ़ जाता है।"
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