
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की असहमति पर विपक्ष और सरकार के अपने-अपने तर्क हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की असहमति और औपचारिक आपत्तियों पर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 2023 के नए कानून के तहत की गई है, जिसमें चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया था।
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की असहमति के कई मायने निकाले जा रहे हैं.
विपक्ष का कहना है कि ज्ञानेश कुमार मनमानी तरीक़े से फ़ैसले ले रहे हैं और सत्ताधारी बीजेपी का कहना है कि असहमति 'वाइब्रेंट लोकतंत्र' में बहुत ही आम बात है.
चुनाव आयोग ने पूरे मामले पर जारी आधिकारिक बयान में कहा है कि जो भी फ़ैसले लिए जा रहे हैं वे संविधान सम्मत हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त से चुनाव आयुक्तों की असहमति कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार इसे अप्रत्याशित माना जा रहा है. देशभर में एसआईआर की प्रक्रिया तीनों चुनाव आयुक्तों की निगरानी में चल रही है. लेकिन प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की है.
उनका कहना है कि कई फ़ैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए और जारी किए गए. इनमें से एक दिन तो चार बार ऐसी आपत्तियां दर्ज की गईं.
तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मोदी सरकार के कार्यकाल में 2023 के क़ानून के तहत हुई थी. नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल थे. इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले सिलेक्शन पैनल में गृह मंत्री की जगह सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस होते थे लेकिन मोदी सरकार ने नियम बदल दिया था और चीफ़ जस्टिस की जगह गृह मंत्री को जगह दे दी थी.
मोदी सरकार का यह फ़ैसला काफ़ी विवादित रहा था. बुधवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि सरकार के इस फ़ैसला से जनता के बीच ग़लत संदेश गया.
मार्च 2024 में जब सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, तब समिति में विपक्ष के सदस्य कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज की थी.
फ़रवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी असहमति दर्ज की थी.
यानी मोदी सराकर ने जिन दो अधिकारियों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू को अपनी पसंद से चुनाव आयुक्त बनाया, उन्होंने ही ज्ञानेश कुमार से फ़ैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू कौन हैं?
चुनाव आयुक्त बनने से ठीक पहले विवेक जोशी हरियाणा के मुख्य सचिव थे, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने इससे पहले उत्तराखंड के मुख्य सचिव के रूप में काम किया था.
संधू का मुख्य सचिव के रूप में कार्यकाल जनवरी 2024 में समाप्त हुआ था और उन्होंने 15 मार्च 2024 को निर्वाचन आयोग में पदभार संभाला. जोशी जब 19 फ़रवरी 2025 को निर्वाचन आयोग में शामिल हुए, तब वह हरियाणा के मुख्य सचिव थे.
डॉ. विवेक जोशी 1989 बैच के हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. उन्होंने आईआईटी रुड़की (तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
इसके बाद आईआईएफटी, दिल्ली से इंटरनेशनल बिज़नेस में एग्जीक्यूटिव मास्टर डिग्री और ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, जिनेवा से इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री और पीएचडी की.
विवेक जोशी के पिछले पद
हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव,चुनाव आयुक्त नियुक्त होने से ठीक पहले उनका यही पद था.
सचिव, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार.
सचिव, वित्तीय सेवा विभाग, भारत सरकार.
भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त.
केंद्र सरकार के कपड़ा, महिला एवं बाल विकास और वित्त से जुड़े मंत्रालयों/विभागों में विभिन्न पदों पर कार्य किया.
हरियाणा में जींद, हिसार और पंचकूला ज़िलों के उपायुक्त रहे.
अंबाला मंडल के मंडलायुक्त रहे.
हरियाणा राज्य वित्त आयोग के सदस्य सचिव रहे.
भारतीय रिज़र्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के बोर्ड में सदस्य रहे.
सुखबीर सिंह संधू
डॉ. सुखबीर सिंह संधू 1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारी हैं.पंजाब से ताल्लुक रखने वाले डॉ. सुखबीर सिंह संधू ने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, अमृतसर से एमबीबीएस किया है.
सुखबीर सिंह संधू के पिछले पद
उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव, जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक, चुनाव आयोग में शामिल होने से पहले राज्य सरकार में उनका यह अंतिम प्रमुख पद था.
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के चेयरमैन, 2019 से 2021 तक.
कुछ समय के लिए भारत के लोकपाल के सचिव रहे.
उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त सचिव, भारत सरकार आईआईटी और आईआईएम समेत कई संस्थानों की ज़िम्मेदारी संभाली.
2007 से 2014 के बीच तीन राजनीतिक दलों से जुड़े चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव रहे.
उत्तराखंड में और इससे पहले पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश में बुनियादी ढांचा विकास, राजमार्ग, पीपीपी परियोजनाओं, शहरी विकास, बिजली, उद्योग और वित्त से जुड़े विभागों में सचिव स्तर के पदों पर काम किया.
हरिद्वार, गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) और ऊधम सिंह नगर के कलेक्टर/ज़िलाधिकारी रहे.
जोशी और संधू ने कैबिनेट सचिव को क्यों लिखा?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपने काम में हुए बदलावों को लेकर अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था. इन बदलावों का असर चुनावी मतदाता सूचियों से जुड़ी आईटी व्यवस्था की निगरानी पर पड़ रहा था.
हालांकि कैबिनेट सचिव निर्वाचन आयोग की निगरानी करने वाले अधिकारी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि ये पत्र प्रशासनिक स्तर पर उठाए असाधारण गए क़दम प्रतीत होते हैं. आयोग के भीतर किसी विवाद को सुलझाने का वैधानिक तरीक़ा उसका निर्णय है, जो आमतौर पर सर्वसम्मति से और ज़रूरत पड़ने पर बहुमत से लिया जाता है.
अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित है. आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त को आम तौर पर 'फर्स्ट एमंग इक्वल' माना जाता है, न कि एकतरफ़ा फ़ैसला लेने वाला अधिकारी.
2023 के उस क़ानून की धारा 18, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों से संबंधित है, के मुताबिक:
आयोग का कामकाज जहाँ तक संभव हो, सर्वसम्मति से चलाया जाना चाहिए.
अगर सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो मामले का फ़ैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाएगा.
आयोग अपनी कार्यप्रणाली तय कर सकता है और अपने काम का बँटवारा या आवंटन कर सकता है, लेकिन यह काम सर्वसम्मति से लिए गए फ़ैसले के ज़रिए होना चाहिए.
अगर संधू और जोशी को लगता था कि काम आवंटन से जुड़ा कोई आदेश उनकी सहमति के बिना जारी किया गया तो उनका सबसे मज़बूत औपचारिक उपाय सामान्य तौर पर यह होता कि वे मामले को तीन सदस्यीय आयोग के सामने औपचारिक रूप से रखने की मांग करते, अपनी असहमति को लिखित रूप में दर्ज कराते और फिर बहुमत के आधार पर फ़ैसला कराने की मांग करते.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, दोनों ने लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं और मुख्य चुनाव आयुक्त को भी इसकी प्रति भेजी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तीनों निर्वाचन आयुक्तों की नौ सितंबर को बैठक हुई थी, जो चार महीने में उनकी पहली पूर्ण बैठक थी.
जोशी और संधू की नियुक्ति पर कांग्रेस की आपत्ति क्या थी?
कांग्रेस का विरोध मुख्य रूप से नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर था, न कि इस आरोप को लेकर कि डॉ. सुखबीर सिंह संधू या डॉ. विवेक जोशी व्यक्तिगत रूप से इस पद के लिए अयोग्य थे.
कांग्रेस का मूल तर्क था कि चयन की व्यवस्था केंद्र सरकार को समिति में प्रभावी बहुमत देती है और नियुक्ति समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है.
सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति
जब मार्च 2024 में सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया था, तब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तीन सदस्यीय चयन समिति में विपक्ष के प्रतिनिधि थे. उन्होंने एक असहमति नोट दिया था.
उनकी प्रमुख आपत्तियां थीं-
उन्होंने कहा था कि 212 नामों की सूची बैठक से सिर्फ़ एक दिन पहले दी गई, जबकि अंतिम छह नामों की शॉर्टलिस्ट चयन के फ़ैसले से महज 10 मिनट पहले साझा की गई.
उनका कहना था कि इससे शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की सार्थक जांच-पड़ताल का पर्याप्त अवसर नहीं मिला.
उन्होंने 2023 के उस नियुक्ति क़ानून पर आपत्ति जताई, जिसमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया.
चौधरी का तर्क था कि प्रधानमंत्री और उनकी ओर से नामित कैबिनेट मंत्री के समिति में होने से सरकार को 2-1 का बहुमत मिल जाता है और वह अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन कर सकती है.
उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह संधू की नियुक्ति को मनमाना नहीं बता रहे हैं; उनकी आपत्ति प्रक्रियागत कमियों और चयन व्यवस्था की संरचना को लेकर थी.
विवेक जोशी की नियुक्ति
फ़रवरी 2025 में जब विवेक जोशी को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया, उसी दिन ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनाया गया था. उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक असहमति नोट दिया था.
राहुल गांधी ने अपने नोट में लिखा था, समिति ने नियुक्तियों की प्रक्रिया उस समय आगे बढ़ाई, जब 2023 के नियुक्ति क़ानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 19 फ़रवरी 2025 को निर्धारित थी.
गांधी का तर्क था कि अदालत की ओर से क़ानून की वैधता और चयन समिति की संरचना पर विचार किए जाने तक सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया टाल देनी चाहिए थी.
उन्होंने इस फ़ैसले को "जल्दबाजी भरा", "अनादरपूर्ण" और अदालत के साथ संवैधानिक संस्थाओं के प्रति "अशिष्ट" बताया.
कांग्रेस का कहना था कि चयन समिति से चीफ़ जस्टिस को हटाने से कार्यपालिका के प्रभाव से निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने वाला सुरक्षा उपाय कमज़ोर हुआ.
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के अनूप बरनवाल फ़ैसले का हवाला दिया. उस फ़ैसले में संसद की ओर से क़ानून बनाए जाने तक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई वाली चयन समिति का प्रावधान किया गया था.

Leader of Opposition in Lok Sabha Rahul Gandhi has demanded the resignation of Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar over alleged irregularities in the Election Commission. The demand comes after a report by The Indian Express, which claimed that two election commissioners had raised objections to the commission's decisions.
Cockroach Janata Party founder Abhijeet Dipke demanded the resignation of Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar, accusing him of threatening Indian democracy amid controversies over electoral roll revisions.
According to Election Commission statements, BJP spent ₹286.99 crore on West Bengal elections alone, surpassing Congress' ₹248.55 crore total across four states and a Union territory.
Congress MP Priyanka Gandhi Vadra accused Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar of criminally tampering with electoral rolls by deleting 13 crore voter names, calling it treason and demanding prosecution, while the ECI and BJP defended the process as unanimous and democratic.

Following reports of differences of opinion between Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar and two election commissioners in the Election Commission, opposition leaders have demanded re-conduct of the assembly elections held in Maharashtra, West Bengal and Tamil Nadu. Uddhav Thackeray, Mamata Banerjee, Arvind Kejriwal and Rahul Gandhi have demanded action against the Chief Election Commissioner and alleged irregularities in the election process, while the Election Commission and BJP have rejected these allegations.

The opposition has stepped up its demand for impeachment against Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar in the backdrop of 'The Indian Express' report that during the SIR campaign last year, election commissioners were not informed about several decisions and raised objections. The Election Commission said that all final decisions were taken unanimously.