
साझा रक्षा समझौते के तहत सचिवालय बनाने और सैन्य प्रमुखों की बैठक पर चर्चा, लेकिन सैन्य मदद का अभी कोई फ़ैसला नहीं।
सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले बढ़ने के बाद पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क में साझा रक्षा समझौते के तहत सचिवालय बनाने और सैन्य प्रमुखों की बैठक बुलाने पर चर्चा की है, हालांकि अभी सैन्य मदद का कोई फ़ैसला नहीं हुआ है।
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सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में एक साझा रक्षा समझौते पर दस्तख़त किए थे।
प्रकाशित एक घंटा पहले
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सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले बढ़ने के बाद पाकिस्तान और तुर्की उसकी किस तरह मदद करेंगे? तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने अपने साझा रक्षा समझौते के तहत इस पर बात की है. लेकिन सैन्य मदद या हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ साझा कार्रवाई का कोई फ़ैसला अभी नहीं हुआ है.
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक़ डार, सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान और तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने मुलाक़ात की.
बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' के तहत सचिवालय, समितियां और काम करने वाले समूह बनाने में हुई प्रगति की समीक्षा की.
तीनों देशों की सेनाओं के प्रमुखों की एक तत्काल बैठक बुलाने पर भी चर्चा हुई. इसमें सऊदी अरब की मदद के तरीक़ों पर बात होनी है. इस सैन्य बैठक की तारीख़ नहीं बताई गई है.
सऊदी अरब को किस तरह की मदद दी जा सकती है, यह भी साफ़ नहीं किया गया है. अल जज़ीरा के मुताबिक़, समझौते को अब तक औपचारिक रूप से लागू करने का एलान भी नहीं हुआ है.
मक्का रक्षा समझौता क्या है?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में इस समझौते पर दस्तख़त किए थे. इसमें कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हथियारबंद हमला सभी पर हमला माना जाएगा.
दस्तख़त के बाद 31 अगस्त को तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों तथा सैन्य अधिकारियों ने इस्तांबुल में समझौते से जुड़ी पहली बैठक की थी. वहां सऊदी अरब में एक सचिवालय बनाने और रक्षा के मामलों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी थी.
लेकिन समझौते की यह शर्त अपने आप यह नहीं बताती कि हमला होने पर तीनों देशों की सेनाएं क्या करेंगी. समझौते पर दस्तख़त होने के बाद तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने कहा था कि जिस देश पर हमला हुआ हो, उसे मदद मांगनी होगी और बताना होगा कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है.
उनके मुताबिक़, मदद ख़ुफ़िया जानकारी, सैन्य सामान या सैनिकों के रूप में हो सकती है. लेकिन अभी इसकी खुले तौर पर घोषणा नहीं हुई है.
हूती कौन हैं?
हूती, जिन्हें 'अंसार अल्लाह' भी कहा जाता है, यमन का एक हथियारबंद समूह है. इसकी शुरुआत उत्तरी यमन के सादा इलाक़े में ज़ैदी शिया समुदाय से जुड़े आंदोलन के रूप में हुई थी. समूह ने 2014 में राजधानी सना पर नियंत्रण कर लिया.
आज हूती विद्रोहियों का नियंत्रण यमन के उत्तर और उत्तर-पश्चिम के बड़े हिस्से में है. हाल की लड़ाई में उन्होंने लाल सागर के तट पर भी अपना नियंत्रण बढ़ाया है.
दूसरी ओर, यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का नेतृत्व प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल करती है. उसे सऊदी अरब का समर्थन हासिल है.
सना पर हूती विद्रोहियों के क़ब्ज़े के बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब ने यमन की तत्कालीन मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन हासिल है, हालांकि समूह के अपने स्थानीय हित और लक्ष्य भी हैं.
लड़ाई फिर कैसे तेज़ हुई?
अप्रैल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए संघर्ष विराम के बाद लड़ाई में काफ़ी कमी आई थी. लेकिन इससे यमन का संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ.
जुलाई 2026 में हूती विद्रोहियों ने सऊदी जहाज़ों की समुद्री आवाजाही रोकने का एलान किया. समूह ने इसे अपने इलाक़ों पर लगी पाबंदियों का जवाब बताया.
इसके बाद यमन के भीतर लड़ाई बढ़ी और सऊदी अरब की ओर मिसाइल तथा ड्रोन हमलों की ख़बरें आने लगीं. ये घटनाएं ऐसे समय हुईं जब हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बलों के बीच लाल सागर के तट पर भी संघर्ष तेज़ हो रहा था.
यमन में इस लड़ाई की क़ीमत आम लोग भी चुका रहे हैं. अल जज़ीरा ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के हवाले से बताया है कि सितंबर की शुरुआत से 2.3 लाख से ज़्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं.
सऊदी अरब के लिए यनबू और समुद्री रास्ते क्यों अहम हैं?
सऊदी अरब के सामने अपने शहरों और तेल से जुड़े ठिकानों की सुरक्षा का सवाल है. लाल सागर के किनारे उसका यनबू बंदरगाह तेल के निर्यात के लिए अहम है. एक पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों से यनबू तक पहुंचती है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही बाधित होने के बीच इस रास्ते की अहमियत और बढ़ी है.
यमन के तट के पास बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है. जहाज़ों के लिए यह एक अहम रास्ता है. हूती विद्रोहियों के लाल सागर तट पर हालिया बढ़त के बाद यहां से होने वाली आवाजाही की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ी है.
सऊदी अरब का कहना है कि गुरुवार को उसकी हवाई सुरक्षा प्रणाली ने ताइफ़ और यनबू की ओर दागी गई छह बैलिस्टिक मिसाइलें मार गिराईं. दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों ने रियाद में एक ठिकाने और यनबू में सऊदी अरामको की सुविधाओं पर मिसाइल और ड्रोन हमले का दावा किया है. अधिकारियों ने इन दावों से हुए किसी नुक़सान की पुष्टि नहीं की है.
बीबीसी फ़ारसी की लाइव रिपोर्ट के मुताबिक़, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सऊदी अरब में नागरिक और ऊर्जा से जुड़े ठिकानों पर हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों की निंदा की है.
वहीं बीबीसी उर्दू के मुताबिक़ तीनों विदेश मंत्रियों ने मक्का और सऊदी अरब के नागरिक तथा आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाने वाले हमलों की निंदा की. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन भी किया.
अब तक क्या तय हुआ है?
अभी तक सामने आया ठोस क़दम विदेश मंत्रियों की बैठक और सेनाओं के प्रमुखों की बैठक बुलाने पर चर्चा है. पाकिस्तान और तुर्की ने हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई का एलान नहीं किया है.
बीबीसी उर्दू ने तुर्की की संसद के स्पीकर नुमान कुर्तुलमुश का यह बयान भी दिया है कि समझौता किसी ख़ास देश के ख़िलाफ़ नहीं है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में ईरान समेत दूसरे मुस्लिम देश इससे जुड़ सकते हैं और समझौता अक्तूबर से तुर्की की संसद में मंज़ूरी के लिए पेश किया जा सकता है.
सऊदी अरब को दूसरे देश क्या मदद दे रहे हैं?
अल जज़ीरा के मुताबिक़ पाकिस्तान और तुर्की के साथ बातचीत के अलावा सऊदी अरब को दूसरे देशों से भी मदद का भरोसा मिला है. ब्रिटेन ने सऊदी लड़ाकू विमानों को उड़ान के दौरान ईंधन देने पर सहमति जताई है.
फ़्रांस ने कहा है कि वह यनबू बंदरगाह की सुरक्षा के लिए सैनिक, रडार और रक्षा प्रणाली भेजेगा. दोनों देशों ने अपने इन क़दमों को सऊदी अरब की सुरक्षा से जोड़ा है. हालांकि, यह मदद मक्का रक्षा समझौते से अलग है.
यमन की सरकार क्या कर रही है?
यमन में लड़ाई सिर्फ़ हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच नहीं चल रही है. सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बल भी हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.
इस हफ़्ते उन्होंने ताइज़ के पास कुछ अहम ऊंची जगहों पर नियंत्रण हासिल करने और हूती विद्रोहियों के हमले रोकने का दावा किया है.
वहीं, सात बड़े औद्योगिक देशों के समूह जी-7 के विदेश मंत्रियों ने भी सऊदी अरब और यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों की निंदा की है.
AI outlook — possibilities, not facts
मक्का रक्षा समझौता अक्तूबर से तुर्की की संसद में मंज़ूरी के लिए पेश किया जा सकता है।
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