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Backकोयंबटूर में मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष जिम, सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए 300 से अधिक महिलाओं को दे रहा है फिटनेस का अवसर
कोयंबटूर में मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष जिम, सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए 300 से अधिक महिलाओं को दे रहा है फिटनेस का अवसर
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कोयंबटूर में मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष जिम, सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए 300 से अधिक महिलाओं को दे रहा है फिटनेस का अवसर

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कोयंबटूर के सारामेडु इलाके में शबाना द्वारा संचालित एक विशेष जिम में रोजाना 300 से अधिक मुस्लिम महिलाएं ट्रेनिंग करती हैं, जो सामाजिक प्रतिबंधों और पारिवारिक झिझक को तोड़ते हुए अपने स्वास्थ्य और आत्मविश्वास में सुधार ला रही हैं।

AI-generated summary

Why It Matters

कोयंबटूर के सारामेडु इलाके में मुस्लिम महिलाओं के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाओं के कारण जिम तक सीमित पहुंच थी, जिसे शबाना ने अपने व्यक्तिगत फिटनेस सफर और ट्रेनिंग अनुभव के बाद बदलने की पहल की।

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Author, ज़ेवियर सेल्वाकुमार

पदनाम, बीबीसी तमिल

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

नोट: जिम जाने या ज्वाइन करने से पहले अपनी सेहत के बारे में डॉक्टर से परामर्श ज़रूर कर लें

तीन बच्चों की मां राशिदा कहती हैं, "अगर कोई लड़का कहे कि वह जिम जाना चाहता है, तो उसे तुरंत इसकी इजाज़त मिल जाती है. लेकिन अगर कोई लड़की कहे कि वह जिम जाना चाहती है, तो ऐसा तुरंत नहीं होता."

"आम तौर पर समाज में यह ग़लत धारणा है कि जिम पुरुषों के लिए फिटनेस ट्रेनिंग की जगह है. जबकि यह महिलाओं के लिए भी है. इसी तरह इस्लाम में भी जिम जाने पर कोई रोक नहीं है."

वो कहती हैं, "मेरी तीनों डिलीवरी सिजेरियन हुई थीं. इसलिए डॉक्टरों ने मुझे ज़्यादा वज़न उठाने से मना किया था. यहां मुझे अच्छी ट्रेनिंग दी गई. जब मैंने यहां आना शुरू किया था, तब मेरा वज़न 78 किलो था. अब मैंने 13 किलो वज़न कम कर लिया है."

वहीं हसीना कहती हैं, "शुरुआत में मैंने घर पर कहा था कि मैं वॉक करने जा रही हूं और जिम आ गई. मेरा इरादा था कि पहले कुछ हासिल करूं और फिर घरवालों को बताऊं. यहां स्किपिंग प्रतियोगिता में पहला इनाम जीतने के बाद मैंने घरवालों को बताया कि मैं जिम जाती हूं. घर में सभी बहुत ख़ुश हुए."

इन महिलाओं की तरह ही कोयंबटूर के सारामेडु इलाके में मुस्लिम महिलाओं के लिए ख़ास तौर पर चलाए जा रहे जिम में 300 से ज़्यादा महिलाएं रोज़ाना ट्रेनिंग करती हैं. बीबीसी तमिल ने इस जिम का दौरा किया और वहां मौजूद महिलाओं से बातचीत की.

वज़न कम करने गई महिला ने शुरू किया जिम

कोयंबटूर के सारामेडु इलाके की रहने वाली शबाना पिछले 9 महीनों से मुस्लिम महिलाओं के लिए ख़ास तौर पर यह जिम चला रही हैं.

शादी और दो बच्चों के जन्म के बाद शबाना अपना वज़न कम करने के लिए जिम गई थीं. बाद में उसी जिम में महिलाओं की ट्रेनर बन गईं. वह कहती हैं कि उन्होंने अपने इलाके की मुस्लिम महिलाओं के लिए ख़ास तौर पर यह जिम शुरू किया.

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शबाना ने बताया, "मैंने सिर्फ़ सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की है. 19 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी. बच्चे होने के बाद मुझे कुछ सर्जरी करवानी पड़ी. इसकी वजह से मुझे शारीरिक तौर पर कुछ परेशानियां होने लगीं. मेरा वज़न भी बहुत बढ़ गया था. जब मैंने वज़न कम करने के लिए अपने इलाके में जिम तलाशा, तो यहां कोई जिम नहीं था. इसके बाद मैं एक जिम में गई और वहीं महिलाओं की ट्रेनर बन गई."

उन्होंने कहा, "इसके बाद मैंने सोचा कि अपने इलाके में महिलाओं के लिए अलग जिम शुरू किया जा सकता है. तब जिस जिम में मैं काम करती थी, उसके मालिक जयकांत और मेरे ट्रेनर हर्षद, दोनों ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया. उन्हीं के प्रोत्साहन से मैं 'वेट लिफ्टर' बनी. जब मैंने उनसे सलाह मांगी, तो उन्होंने मुझे जिम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया."

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शबाना पिछले पांच साल से वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग ले रही हैं. उन्होंने राज्य स्तर की कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और पुरस्कार भी जीते हैं. उन्होंने बताया कि हाल ही में उन्होंने पुरुष वेटलिफ्टिंग खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने के लिए होने वाली परीक्षा भी पास की है.

शबाना ने बताया कि उनके पति कबीर, प्लस टू में पढ़ने वाली बेटी और नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला बेटा, सभी उन्हें बहुत प्रोत्साहित करते हैं. वे हर काम में उनका साथ देते हैं. इसी वजह से वह यह जिम शुरू कर पाईं और इसे सफलतापूर्वक चला पा रही हैं. उन्होंने बताया कि जिम शुरू करने के शुरुआती दिनों में इसका विरोध भी हुआ था और महिलाएं यहां आने से झिझकती थीं.

शबाना ने कहा, "जब मैंने यह जिम शुरू किया, तो कई तरह का विरोध हुआ. जब मीडिया में इसके बारे में ख़बर आई, तो इतने ख़राब और आपत्तिजनक कमेंट आए कि उन्हें बाहर भी नहीं बताया जा सकता. एक समय पर हमने इसे बंद करने का फ़ैसला कर लिया था. लेकिन फिर मैंने सोचा कि हमारी आलोचना करने वाले चार लोगों की वजह से हमें अपनी कोशिश क्यों छोड़नी चाहिए. मैंने सोचा कि उनके सामने जीतकर दिखाना है. इसी सोच के साथ मैं यह जिम चला रही हूं."

"कई लोगों ने यह कहते हुए रुकावटें पैदा कीं कि एक महिला जिम नहीं चला सकती. कुछ लोगों ने कहा कि महिलाओं को जिम की क्या ज़रूरत है. वे घर का काम करें और बच्चों की देखभाल करें, इससे ही वे स्वस्थ रहेंगी. शुरुआत में सिर्फ़ 20 महिलाएं आती थीं. कुछ परिवारों में पति ही अपनी पत्नी को यहां लेकर आए. इसके बाद धीरे-धीरे महिलाओं का भरोसा बढ़ा और वे यहां आने लगीं."

अभी सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक, दो-दो घंटे के छह बैच में ट्रेनिंग कराई जाती है. हर बैच में औसतन 50 महिलाएं होती हैं. इस तरह कुल 300 से ज़्यादा मुस्लिम महिलाएं यहां रोज़ाना एक्सरसाइज़ करती हैं. ज़्यादातर महिलाएं यहां वज़न कम करने के लिए आई थीं और अब शरीर को मज़बूत बनाने वाली एक्सरसाइज़ कर रही हैं.

बीबीसी से बात करते हुए राशिदा ने कहा, "कहा जाता है कि स्वस्थ महिला का मतलब स्वस्थ परिवार है. मैं जिम को सिर्फ़ एक्सरसाइज़ करने की जगह नहीं, बल्कि ऐसी जगह भी मानती हूं जहां आने से ख़ुशी मिलती है."

"मेरी तरह घर पर रहने वाली महिलाओं के लिए यहां आना सिर्फ़ सेहत के लिए ही फ़ायदेमंद नहीं है, बल्कि तनाव कम करने में भी मदद करता है. घर का काम ख़त्म करके जब मैं यहां आती हूं, तो यह मुझे अपने दूसरे घर जैसा लगता है. यहां मुझे बहुत सारे दोस्त मिले हैं. अगर यही जिम हमारे इलाके से बाहर होता, तो पता नहीं मैं यहां आ पाती या नहीं. लेकिन यह हमारे इलाके में ही है, इसलिए मेरे लिए यहां आना आसान है."

'फ़िटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ी'

राशिदा बताती हैं कि यहां ट्रेनिंग शुरू करने के तीन महीने में उन्होंने 7 किलो वज़न कम किया. हसीना ने भी वज़न कम होने की बात कही. इनके अलावा कुछ और महिलाओं ने भी बताया कि यहां आकर जीवन के प्रति उनका रवैया सकारात्म हुआ है.

गृहिणी रहीजा शाहजहान ने बताया कि यहां आने से पहले उन्हें खान-पान के बारे में कोई जागरूकता नहीं थी.

रहीजा कहती हैं, "हम जैसी महिलाएं घर के काम में इतनी व्यस्त रहती हैं कि अपनी सेहत का ध्यान ही नहीं रखतीं. भूख लगी तो कुछ भी खा लेते हैं. उसमें प्रोटीन है या फ़ाइबर, यह भी पता नहीं होता. यहां आने के बाद ही पता चला कि खाने में इतनी सारी चीज़ों का ध्यान रखना होता है. ट्रेनर हमें बताते हैं कि प्राकृतिक खाने की किन चीज़ों में कौन-से पोषक तत्व होते हैं. हम अब उसका पालन करते हैं."

आईटी कर्मचारी मरियम फ़रहाना ने बीबीसी तमिल से कहा, "यहां आने के बाद हमें शारीरिक फ़ायदे तो हुए ही हैं, साथ ही हमने एक बेहतर जीवनशैली, किसी काम को व्यवस्थित तरीके से करना और समय की पाबंदी जैसी कई चीज़ें भी सीखी हैं. किसी काम पर पूरी लगन से ध्यान देना और अपना ध्यान भटकने न देना, इससे हमारे मन में नया भरोसा और उत्साह आया है."

मरियम फ़रहाना ने कहा, "यहां स्कूल और कॉलेज की छात्राओं से लेकर 60 साल की महिलाएं तक आती हैं. इसकी वजह यहां हमें मिलने वाली आज़ादी है. यहां 300 से ज़्यादा मुस्लिम महिलाएं आती हैं. हमारी इच्छा है कि हमें देखकर और भी मुस्लिम महिलाएं बिना किसी झिझक के यहां आएं,"

आईटी कंपनी में काम करने वाली शबीना ने कहा, "आईटी कंपनी में काम करने की वजह से मुझे बहुत तनाव रहता था. यहां आने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरा शरीर और मन रिलैक्स हो गया है. एक मां के तौर पर अब मैं घर और काम, दोनों को बराबर संभाल पा रही हूं. इस एक्सरसाइज़ ने इसमें मेरी बहुत मदद की है."

"यहां सिर्फ़ महिलाएं होती हैं, यह एक अच्छी बात है. काम का समय बदलने के बावजूद किसी भी समय यहां आकर एक्सरसाइज़ कर सकना भी बहुत सुविधाजनक है. ज़्यादातर महिलाएं अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर देती हैं. उनके जैसी महिलाएं अगर अपने लिए भी थोड़ा समय निकालकर इस तरह एक्सरसाइज़ करें, तो इससे अच्छा बदलाव आ सकता है. इसके लिए उन्हें बस एक छोटा-सा क़दम उठाना होगा,"

परिवार का क्या रवैया है?

शाहिदा समेत कई महिलाएं सुबह 5 बजे यहां ट्रेनिंग के लिए आती हैं. कई लोगों ने बताया कि इन सभी महिलाओं को रोज़ सुबह 4 बजे से उठाने का काम भी शबाना ही करती हैं. बीबीसी से बात करने वाली कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें रोज़ जिम आने के लिए अपने परिवार का समर्थन मिलता है.

इस बारे में स्कूल टीचर शाहिदा ने कहा, "यहां आने वाली महिलाओं को परिवार से मिलने वाला समर्थन हर किसी के लिए अलग-अलग है. मेरे घर में मुझे सबसे पहले जिम जाने के लिए मेरे पति ने ही प्रोत्साहित किया था. कई दिनों तक वही मुझे उठाते भी हैं. तीन महीने पहले एक दिन सुबह मेरी सास ने मुझे उठाया और पूछा, 'तुम जिम के लिए नहीं निकल रही हो?' उस समय मुझे अंदर से बहुत ख़ुशी हुई!"

इस जिम में ट्रेनिंग लेने वाली ज़्यादातर मुस्लिम महिलाएं बुर्क़ा और हिजाब पहनकर ही एक्सरसाइज़ करती हैं. ट्रेनर भी बुर्क़ा पहनकर ट्रेनिंग देती हैं.

इस बारे में रहीजा शाहजहान ने कहा, "यहां सिर्फ़ महिलाएं होती हैं, इसलिए हम एक्सरसाइज़ वाले कपड़े पहनकर भी ट्रेनिंग कर सकते हैं. हम अपनी सुविधा के हिसाब से एक्सरसाइज़ करते हैं. यहां किसी तरह की पाबंदी नहीं है."

शबाना ने बताया कि हालांकि उन्होंने यह जिम मुस्लिम महिलाओं के लिए ख़ास तौर पर शुरू किया था, लेकिन दूसरे धर्मों की कुछ महिलाएं भी यहां ट्रेनिंग ले रही हैं. इतनी सारी महिलाओं के यहां आने और शारीरिक तौर पर अच्छा बदलाव देखने के बावजूद जिम की मालिक और ट्रेनर शबाना ने दुख जताया कि उन्हें अब भी अपने शरीर को लेकर ताने सुनने पड़ते हैं.

"यहां आने वाले कई लोग मुझे देखकर कहते हैं कि ट्रेनर ख़ुद इतने वज़न की हैं. मैं अपना वज़न और कम कर सकती हूं. लेकिन मैं एक वेटलिफ्टर हूं. मैंने इसी वज़न के साथ इसकी ट्रेनिंग ली है. मैंने कई प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की है. मुझे भरोसा है कि मैं आगे भी कई प्रतियोगिताएं जीतूंगी," शबाना ने कहा.

शबाना बताती हैं कि एक ही समय पर सभी महिलाओं के लिए उपकरणों पर एक्सरसाइज़ करने के लिए जगह और उपकरण दोनों पर्याप्त नहीं हैं. जिम में ट्रेडमिल, बैटल रोप्स, स्टेशनरी बाइक और डम्बल्स जैसे कुछ बुनियादी उपकरण हैं. आधुनिक उपकरण ज़्यादा नहीं हैं. इसके बावजूद वह ज़्यादातर महिलाओं को ज़मीन पर की जाने वाली एक्सरसाइज़ सिखाती हैं. उनका कहना है कि वज़न कम करने में इस तरह की एक्सरसाइज़ काफ़ी फ़ायदेमंद होती हैं।

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • अगले 6 महीनों में कोयंबटूर के अन्य इलाकों में podobित महिलाओं के लिए जिम खोले जा सकते हैं

    Possible · Within months

Open Questions

  • क्या इस मॉडल को अन्य शहरों में दोहराया जा सकता है?
  • जिम के संचालन के लिए वित्तीय संसाधन कहाँ से आ रहे हैं?
  • क्या इस जिम ने स्थानीय स्वास्थ्य संकेतकों पर कोई मापनीय प्रभाव डाला है?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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