मतदाता सूचियों के एसआईआर और चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
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सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल और बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
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Why It Matters
चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों को अपडेट करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान शुरू किया था।
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाए गए हैं.
याचिकाओं में उनके ख़िलाफ़ एसआईटी जांच की मांग की गई है और मतदाता सूचियों के देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है.
इस मामले में सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ कर रही है.
ये याचिकाएं द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के कुछ दिन बाद दाखिल की गईं थी.
रिपोर्ट में बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मतदाता सूचियों के एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं.
आइए जानते हैं अब तक पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?.
"ये सिर्फ़ उपचुनाव हैं, बस इतनी-सी बात है."
भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने 26 सितंबर, 2026 को इन शब्दों के साथ पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बाहर किए जाने का दावा करने वाले लोगों की याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया था.
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से कहा था कि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची से बाहर हुए लोग अप्रैल में विधानसभा चुनाव के दौरान वोट नहीं दे पाए थे.
वकील ने कहा कि अगर उनकी अपील पर फ़ैसला नहीं हुआ, तो वे छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव में भी वोट नहीं दे पाएंगे.
उन्होंने तीन जजों की बेंच को बताया कि 18 हज़ार से ज़्यादा अपील लंबित हैं. लेकिन बेंच ने मामले की तुरंत सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की.
ये बात इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी सहित मुख्य विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है.
यह सुनवाई उस मामले की नई कड़ी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में एक साल से ज़्यादा समय से सुनवाई चल रही है.
इस मामले के केंद्र में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर है. भारत के चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए घर-घर जाकर जांच का यह अभियान शुरू किया था.
चुनाव आयोग का कहना है कि मृत, एक से ज़्यादा जगह दर्ज, दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं और ऐसे लोगों के नाम हटाने के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है, जो भारत के नागरिक नहीं हैं.
इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे मतदाताओं पर दस्तावेज़ दिखाने का बोझ डाला गया और वोट देने के योग्य नागरिकों से उनका अधिकार छीन लिया गया.
अदालत ने बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया जारी रहने दी और मई में इसे क़ानूनी भी ठहराया.
लेकिन पश्चिम बंगाल में अदालत ने इस प्रक्रिया पर कहीं ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाई.
लाखों मतदाताओं की जांच की ज़िम्मेदारी ऐसे ट्राइब्यूनल को दी गई, जिनमें सेवा में मौजूद न्यायिक अधिकारी और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज शामिल हैं.
इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची से बाहर हुए लोग तब तक वोट नहीं दे सकते, जब तक उनकी अपील पर सुनवाई नहीं हो जाती.
एसआईआर के ख़िलाफ़ याचिकाओं पर पहली सुनवाई जुलाई 2025 में हुई थी. उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एसआईआर शुरू किया गया था.
दो जजों की बेंच ने कहा था कि यह सवाल "लोकतांत्रिक गणराज्य के कामकाज की जड़ तक जाता है."
अदालत ने सुनवाई के लिए तीन मुद्दे तय किए थे.
क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा करने का अधिकार है?
क्या आयोग की अपनाई गई प्रक्रिया क़ानून के मुताबिक़ है?
क्या इसके लिए तय समय बहुत कम है?
अदालत ने एसआईआर की प्रक्रिया नहीं रोकी. हालांकि, उसने चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि मतदाताओं की पहचान की जांच के लिए आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को भी दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए.
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित होने से रोकने की मांग वाली याचिका पर विचार नहीं किया.
हालांकि, उन्होंने याचिकाकर्ताओं से कहा, "अगर हम आपसे सहमत हुए, तो हम सब कुछ रद्द कर देंगे."
अगस्त में बेंच ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची के मसौदे से बाहर हुए क़रीब 65 लाख लोगों के नाम और उन्हें हटाने की वजह प्रकाशित करने का निर्देश दिया.
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अगर पूनम देवी का नाम हटाया गया है, तो पूनम देवी को पता चलना चाहिए कि उनका नाम हटाया गया है और क्यों हटाया गया है."
आठ सितंबर को अदालत ने आदेश दिया कि आधार कार्ड को पहचान साबित करने वाले 12वें मान्य दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए.
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ़ किया कि आधार कार्ड को "नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा."
30 सितंबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "हर व्यक्ति को अपील करने का अधिकार है."
याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर सवाल करते हुए चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा था कि "अगर मतदाता सूचियों को हर साल बिना बदलाव के कॉपी-पेस्ट किया जाता रहे, तो क्या होगा?"
हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रही है.
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि ये सवाल हैं, "हमारा निष्कर्ष नहीं."
बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 29 दिनों तक सुनवाई हुई. अदालत ने 29 जनवरी को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
उस समय तक बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव भी कराए जा चुके थे.
जनवरी तक एसआईआर की प्रक्रिया पश्चिम बंगाल पहुंच चुकी थी. यहां इस मामले में एक नया शब्द सामने आया— 'तार्किक विसंगति'.
मतदाताओं के दस्तावेज़ों में दिखाई देने वाले अंतर के आधार पर उन्हें जांच के लिए चिह्नित किया गया. इनमें पिता के नाम या माता-पिता की उम्र में अंतर जैसी बातें शामिल थीं.
जनवरी में अदालत ने दर्ज किया कि क़रीब एक करोड़ 36 लाख मतदाताओं को इस श्रेणी में रखा गया था.
चार फ़रवरी को चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वर्तनी की ग़लतियों की वजह से "सही और वास्तविक लोगों को मतदाता सूची से बाहर नहीं छोड़ा जा सकता."
इसके पांच दिन बाद जस्टिस बागची ने नोटिस जारी करने के लिए इस्तेमाल किए गए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ़्टवेयर पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा कि बंगाली परिवारों में 'कुमार' बीच का नाम होता है. लेकिन 'तपन कुमार रॉय' की जगह 'तपन रॉय' लिखा होने जैसे अंतर के कारण भी तार्किक विसंगति का नोटिस जारी हो गया.
उन्होंने कहा, "ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि सॉफ़्टवेयर के इस्तेमाल के कारण बड़े पैमाने पर नोटिस भेजे जा रहे हैं."
इस स्वचालित तरीक़े की आलोचना करते हुए वरिष्ठ वकील मोहन कटारकी ने कहा कि "सुप्रीम कोर्ट असली गड़बड़ी को नहीं पकड़ पाया."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "एसआईआर का मक़सद मृत और दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं के नाम हटाना था. इसके बजाय एक गुप्त एल्गोरिदम के ज़रिए 13 करोड़ भारतीयों के नाम हटा दिए गए. इसके लिए 'तार्किक विसंगति', 'मैपिंग नहीं होना' और 'उम्र में अंतर' जैसी वजहें दी गईं. मशीन ने वर्तनी के अंतर को भी गड़बड़ी मान लिया. मशीन के कोड को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है. ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया."
20 फ़रवरी को अदालत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच "भरोसे की कमी" है, क्योंकि दोनों इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि दावों पर फ़ैसला किन अधिकारियों को करना चाहिए.
अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट से कहा कि वह सेवा में मौजूद और रिटायर्ड न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराए.
इन अधिकारियों को 'तार्किक विसंगति' और मतदाता सूची के पुराने रिकॉर्ड से नहीं जोड़े जा सके लोगों के दावों की जांच करनी थी.
चार दिन बाद अदालत ने इस प्रक्रिया के बड़े पैमाने को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ा दी.
अदालत ने ओडिशा और झारखंड से भी अधिकारियों को बुलाने की अनुमति दी.
इसके साथ ही अदालत ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद पूरक सूचियां भी प्रकाशित की जा सकती हैं. बाद में शामिल किए गए नाम भी अंतिम मतदाता सूची का हिस्सा माने जाएंगे.
10 मार्च को अदालत ने हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों की अध्यक्षता में अपीलीय ट्राइब्यूनल बनाने का आदेश दिया.
इस दौरान चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अब ऐसी स्थिति आ गई है, जहां हमें दोनों पक्षों की नीयत पर संदेह हो रहा है."
उनका इशारा चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच मतभेदों की तरफ़ था.
एक अप्रैल तक क़रीब 60 लाख आपत्तियों में से 46 लाख से ज़्यादा पर फ़ैसला हो चुका था.
उस दिन हुई सुनवाई में जस्टिस बागची ने कहा कि मतदाता सूची से किसी नाम को ग़लत तरीक़े से हटाने या जोड़ने की ग़लती को चुनाव के बाद ट्राइब्यूनल ठीक कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, "अगर किसी व्यक्ति को आज मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाता है और वह इस चुनाव में वोट नहीं दे पाता, लेकिन पूर्व चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता वाले ट्राइब्यूनल को लगता है कि उसे बाहर करना उचित नहीं था, तो हमें कोई वजह नहीं दिखाई देती कि उस फ़ैसले को बदला क्यों नहीं जा सकता और उस व्यक्ति का नाम दोबारा सूची में क्यों नहीं जोड़ा जा सकता."
अप्रैल में मतदान नज़दीक आने तक 34 लाख से ज़्यादा अपील दायर हो चुकी थीं.
13 अप्रैल के अपने आदेश में अदालत ने कहा कि जिन अपील पर 21 या 27 अप्रैल तक फ़ैसला हो जाएगा, उनके नतीजे पूरक मतदाता सूचियों में शामिल किए जाएंगे.
लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि "सिर्फ़ अपील लंबित होने" के आधार पर सूची से बाहर हुए लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा.
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अगर हम इसकी अनुमति देते हैं, तो फिर मतदाता सूची में शामिल लोगों के वोट देने के अधिकार को भी रोक देना चाहिए."
जस्टिस बागची ने कहा कि किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि बेंच "उस सतर्क मतदाता की अनदेखी कर रही है, जिसका नाम सही या ग़लत वजह से सूची में नहीं है."
उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार "राष्ट्रीयता और देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति" है.
उन्होंने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण दिया.
अगर 2002 की मतदाता सूची से जोड़े जा सके वाले यानी 'मैप किए गए' मतदाताओं में से 15 प्रतिशत लोग वोट नहीं दे पाते और उस सीट का नतीजा दो प्रतिशत वोट के अंतर से तय होता है, तो उन्होंने कहा, "हमें निश्चित रूप से इस पर विचार करना होगा."
हालांकि, उन्होंने इस पर कोई राय नहीं दी.
उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर की प्रक्रिया में "ग़लती की कुछ गुंजाइश हमेशा रहती है." अपील की व्यवस्था ऐसी ग़लतियों को ठीक करने के लिए ही बनाई गई है.
इससे पहले हुई एक सुनवाई में उन्होंने कहा था कि अदालत अपील की प्रक्रिया को जल्दबाज़ी में पूरा नहीं करवाना चाहती.
27 मई को अदालत ने बिहार के मामले में अपना फ़ैसला सुनाया.
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की बेंच ने एसआईआर को क़ानूनी ठहराया.
अदालत ने कहा कि संविधान के प्रावधान और जनप्रतिनिधित्व क़ानून, दोनों ही चुनाव आयोग को "जिस तरीक़े को वह उचित समझे", उस तरीक़े से विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देते हैं.
फ़ैसले में इसे चुनाव आयोग को मिला "व्यापक और बिना तय सीमा वाला अधिकार" माना गया.
अदालत ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि वह ख़ुद इससे बेहतर तरीक़ा चुनती या नहीं. सवाल यह है कि चुनाव आयोग का चुना हुआ तरीक़ा "स्पष्ट रूप से ज़रूरत से ज़्यादा" था या नहीं.
अदालत ने कहा कि क़ानून "सबसे कम पाबंदी वाले तरीक़े को अपनाना अनिवार्य नहीं बनाता."
फ़ैसले में कहा गया कि जहां कोई समस्या "व्यवस्था में गहराई तक फैली और बड़े स्तर पर मौजूद" हो, वहां उससे निपटने के लिए उठाए गए व्यापक क़दम को सिर्फ़ इसी आधार पर अनुपात से ज़्यादा नहीं माना जा सकता.
अदालत ने यह समझाते हुए कि वह चुनाव आयोग के चुने तरीक़े की जगह अपनी पसंद का तरीक़ा क्यों लागू नहीं करेगी, कहा, "यह अदालत इस बात की समीक्षा नहीं कर सकती कि एसआईआर के लिए आयोग ने जो प्रक्रिया और तरीक़ा अपनाया, वह सबसे अच्छा या सबसे उचित विकल्प था या नहीं."
फ़ैसले में यह स्वीकार किया गया कि यह प्रक्रिया "जिस तरह शुरुआत में तैयार की गई थी, उससे दस्तावेज़, पारदर्शिता और लोगों की पहुंच को लेकर वाजिब चिंताएं पैदा हुई थीं."
लेकिन अदालत ने कहा कि उसके अपने दख़ल से इन चिंताओं को दूर कर दिया गया.
इनमें आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज़ों में शामिल करना और मतदाता सूची से बाहर किए गए क़रीब 65 लाख मतदाताओं की सूची प्रकाशित करना शामिल था.
अदालत ने कहा कि आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि "मतदान के अधिकार से लोगों को इतने बड़े या व्यवस्थित स्तर पर वंचित किया गया कि इसमें संवैधानिक कमी दिखाई दे."
अदालत ने कहा कि "किसी व्यक्ति विशेष का नाम बाहर होने" जैसे मामलों को अपील के ज़रिए निपटाया जा सकता है.
फ़ैसले में कहा गया कि किसी प्रक्रिया का असर उसकी केवल सैद्धांतिक रूपरेखा के आधार पर नहीं, बल्कि उसे लागू किए जाने के तरीक़े के आधार पर जांचा जाना चाहिए.
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फ़ैसले का सहारा लिया था.
उस फ़ैसले के मुताबिक़, क़ानूनी रूप से यह मानकर चला जाता है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में पहले से मौजूद हैं, वे सही तरीक़े से उसमें शामिल किए गए हैं.
लेकिन अदालत ने कहा कि इस मान्यता को सबूत देकर ग़लत साबित किया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि पुराना फ़ैसला "किसी मामले पर न्यायिक फ़ैसला देने की प्रक्रिया तक सीमित" था.
बेंच ने कहा कि इस मान्यता को "संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल में रुकावट डालने वाली ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता."
नागरिकता के मामले में फ़ैसले ने दो बातों के बीच "साफ़ और सैद्धांतिक अंतर" बताया.
एक तरफ़ मतदाता सूची के लिए चुनाव आयोग की "सीमित जांच" है और दूसरी तरफ़ किसी व्यक्ति की नागरिकता पर औपचारिक फ़ैसला है. नागरिकता पर औपचारिक फ़ैसला लेने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है.
फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पटना की चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी से कहा कि बिहार पर आया फ़ैसला "पहली नज़र में पुराने फ़ैसलों के मुताबिक़ दिखाई देता है. हालांकि, अदालत थोड़ी और सख़्ती दिखाती तो बेहतर होता."
उन्होंने कहा कि "इस फ़ैसले के कुछ पहलू विवादित भी हैं."
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा ने कहा, "लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट को पूरी तरह पता है कि 13 करोड़ लोगों को बाहर कर दिया गया है. भारतीय चुनाव व्यवस्था की विश्वसनीयता बचाने के लिए उसे अब ज़्यादा प्रभावी तरीक़े से दख़ल देना चाहिए."
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी. लोकुर ने भी इतने बड़े स्तर पर हुई प्रक्रिया को लेकर अदालत के रवैये पर चिंता जताई.
उन्होंने कहा, "यह बहुत गंभीर मामला है. सुप्रीम कोर्ट को इस पर फ़ैसला करने में कहीं ज़्यादा समय देना चाहिए था."
उन्होंने कहा, "अदालत को एसआईआर के असर को विस्तार से देखना चाहिए था और नागरिकों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का गहराई से अध्ययन करना चाहिए था."
11 मई को याचिकाकर्ताओं ने कहा कि पश्चिम बंगाल की कम से कम 31 विधानसभा सीटों पर मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी.
अगस्त में जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम सूची से बाहर करना "उससे वोट देने का अधिकार छीनने" जैसा है. उन्होंने कहा कि ऐसी अपील को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
16 सितंबर को दिए गए हलफ़नामे में चुनाव आयोग ने कहा कि 38 लाख अपील में से क़रीब एक लाख 26 हज़ार पर फ़ैसला हो चुका है.
आयोग ने कहा कि 31 सीटों के चुनाव नतीजे रद्द करने की मांग करने वाली याचिका में "नाम हटाए जाने की सभी श्रेणियों को आपस में मिला दिया गया है."
इन श्रेणियों में ग़ैरहाज़िर, दूसरी जगह जा चुके, मृत और एक से ज़्यादा जगह दर्ज मतदाता शामिल थे.
नंदीग्राम में 6,443 अपील में से 89 लोगों के नाम मतदाता सूची में दोबारा जोड़े गए.
रेजिनगर में 12,452 अपील में से चार लोगों के नाम वापस जोड़े गए.
अब इस मामले की सुनवाई पांच अक्टूबर को होनी है.
यह नंदीग्राम और रेजिनगर में होने वाले उपचुनाव से एक दिन पहले की तारीख़ है.
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