
ग़ज़ा में हज़ारों फ़लस्तीनी लापता हैं, जिनके परिवार मलबे के नीचे दबे होने या इसराइली हिरासत में होने की आशंका में जी रहे हैं।
ग़ज़ा में हज़ारों लोग लापता हैं, जिनमें अहमद अल मदून और महमूद अल द्रिमली जैसे युवा शामिल हैं। उनके परिवार मलबे में दबे होने या इसराइली हिरासत में होने की अनिश्चितता के बीच अपनों की तलाश कर रहे हैं, जबकि रेड क्रॉस और मानवाधिकार संगठनों को जानकारी तक पहुँचने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
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ग़ज़ा में जारी युद्ध के कारण हज़ारों लोग लापता हैं, जिनमें से कई के मलबे में दबे होने या इसराइली हिरासत में होने की आशंका है। रेड क्रॉस और मानवाधिकार संगठनों को इन लोगों की जानकारी जुटाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
अहमद अल मदून ऐसे शख़्स लगते थे, जो तमाम मुश्किलों के बावजूद ज़िंदगी से प्यार करते थे. वह शरारती, गोल-मटोल बच्चे जैसे दिखते थे, जिनके चेहरे पर हमेशा खिलखिलाती मुस्कान रहती थी.
ग़ज़ा सिटी में अपने आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त घर में रह रहीं उनकी मां मजदिया हमें अपने फ़ोन पर उनके वीडियो दिखाती हैं.
एक वीडियो में अहमद एक बिल्ली के बच्चे को गोद में लिए हुए हैं. वह जीभ बाहर निकालते हैं और ख़ुशी से चिल्लाते हैं.
दूसरे वीडियो में वह पेट के बल स्विमिंग पूल में छलांग लगाते हैं और फिर पानी से बाहर निकलकर खिलखिलाते दिखाई देते हैं.
मजदिया बीबीसी से कहती हैं, "हर कोई उनका दोस्त था. वह जहां भी जाते, लोग उन्हें प्यार करते थे और उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी."
अहमद को डाउन सिंड्रोम है और वो लापता हैं. 21 साल के अहमद मई 2025 में स्थानीय दुकान पर जाने के बाद लापता हो गए. ग़ज़ा में हमास और इसराइल के बीच जंग का यह समय था.
उस दिन इलाक़े में इसराइली हमले हुए थे और मजदिया को डर है कि उनके बेटे की मौत हो चुकी है. लेकिन वह पक्के तौर पर नहीं जानतीं.
वह कहती हैं, "हे ईश्वर, मुझे चैन नहीं है. मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है, लेकिन जब तक उसे ज़िंदा या मुर्दा नहीं खोज लिया जाता, चाहे वह मलबे के नीचे दबा दो, तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा."
मजदिया जैसा ही दर्द पूरे ग़ज़ा में माएं महसूस कर रही हैं.
हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, इसराइल ने जब से अपना सैन्य अभियान शुरू किया है, तब से ग़ज़ा में 73,000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इनमें पिछले अक्तूबर में युद्धविराम की घोषणा के बाद से मारे गए क़रीब 1,200 लोग भी शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र इन आंकड़ों को विश्वसनीय मानता है.
इसराइली मीडिया ने जनवरी में ख़बर दी थी कि इसराइल के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने कहा था कि सेना इन आंकड़ों को सही मानती है.
लेकिन मारे गए फ़लस्तीनियों की वास्तविक संख्या इससे काफ़ी ज़्यादा हो सकती है. स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों में मलबे के नीचे दबे शव शामिल नहीं हैं. इसका मतलब है कि कई लापता लोग इस संख्या का हिस्सा नहीं हैं.
रेड क्रॉस का कहना है कि उसे ऐसे लापता लोगों का पता लगाने के लिए 5,000 से ज़्यादा अनुरोध मिले हैं, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है. ग़ज़ा की सिविल डिफ़ेंस एजेंसी का मानना है कि लापता लोगों की संख्या 8,000 से ज़्यादा है.
और, हर दिन शव मिल रहे हैं.
इस महीने की शुरुआत में ग़ज़ा सिटी में 100 से ज़्यादा लोगों के लिए सामूहिक अंतिम संस्कार हुआ. ये लोग साल 2023 में इसराइली हमले में मारे गए थे.
उनके अवशेष हाल ही में बरामद और उनकी पहचान की गई थी, जिसके बाद उन्हें दफ़नाया जा सका.
रेड क्रॉस का कहना है कि तबाही के बड़े पैमाने और बुलडोज़र की कमी के कारण शवों को निकालना मुश्किल है.
कई मामलों में अवशेषों की पहचान करना भी मुश्किल है, क्योंकि लोगों की मौत को लंबा समय बीत चुका है और डीएनए जांच की सुविधा भी नहीं है. इसका एक कारण ये भी है कि ग़ज़ा में आने वाली चीज़ों पर इसराइल ने प्रतिबंध लगा रखे हैं.
अहमद अल मदून के परिवार को लगता है कि शायद उनकी हत्या हो गई हो, लेकिन उन्हें यह डर भी है कि इसराइली सुरक्षा बलों ने उन्हें हिरासत में लिया हो.
क़रीब तीन साल से जारी युद्ध के दौरान इसराइली सेना ने ग़ज़ा से लगभग 7,000 फ़लस्तीनियों को हिरासत में लिया है. इनमें से 5,000 से ज़्यादा लोगों को बाद में बिना किसी आरोप के रिहा कर दिया गया.
यह जानकारी इसराइल स्थित पब्लिक कमेटी अगेंस्ट टॉर्चर के अनुसार है.
इस महीने तक ग़ज़ा से क़रीब 1,300 बंदियों को इसराइली जेलों में बिना आरोप या मुक़दमे के रखा गया था. यह जानकारी इसराइली मानवाधिकार संगठन हामोक्ड ने दी है.
संगठन का कहना है कि इन आंकड़ों में इसराइली सेना की सीधी हिरासत में रखे गए ग़ज़ा के बंदी शामिल नहीं हैं.
हामोक्ड और अन्य मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक़, फ़लस्तीनी परिवारों को अक्सर इसराइल की ओर से अपने रिश्तेदारों की ग़िरफ़्तारी या उनके ठिकाने की जानकारी नहीं दी गई है.
इसके चलते कई परिवारों को उनका पता लगाने में मदद के लिए गैर-सरकारी संगठनों और वकीलों पर निर्भर रहना पड़ता है.
बीबीसी ने आईडीएफ़ और इसराइल प्रिज़न सर्विस से हिरासत में लिए गए लोगों के रिश्तेदारों को ख़बर न करने के बारे में सवाल किया.
इस पर इसराइली अधिकारियों ने पहले कहा कि लंबे समय तक हिरासत में रखना जंग के दौरान सुरक्षा कारणों से ज़रूरी था. हालांकि उन्होंने मनमाने तरीक़े से हिरासत में रखने के दावों का खंडन किया.
ग़ज़ा सिटी के सबरा इलाक़े की आइदा अल द्रिमली हमें अपने बेटे महमूद की तस्वीर दिखाती हैं. तस्वीर में फ़लस्तीन का स्कार्फ़ पहने एक मासूम चेहरे वाला युवक दिखाई देता है.
आइदा कहती हैं, "वह शांत और अच्छे व्यवहार वाला लड़का था. वह हर किसी से प्यार करता था और हर कोई उससे प्यार करता था."
महमूद 2024 में लापता हो गए. उनके परिवार को डर था कि इसराइली हमले में उनकी मौत हो गई है.
आइदा हमें बताती हैं, "उनके पिता अस्पतालों में जाते और शवों को देखते. लेकिन मैं इसका सामना नहीं कर सकती थी. मैं पूरी तरह टूट गई थी."
लेकिन इस गर्मी में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर सामने आई, जिसमें दो इसराइली सैनिक एक फ़लस्तीनी बंदी के साथ तस्वीर खिंचवा रहे थे. बंदी की आंखों पर पट्टी बंधी थी और उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे.
आइदा को यकीन है कि वह महमूद हैं.
वो कहती हैं, "उसके चेहरे, माथे, मुंह, नाक, बैठने के अंदाज़, मुंह बंद करने के तरीक़े, हाथों, नीचे से उसके पैरों से लगता है कि वही है. उसकी शक्ल-सूरत बिल्कुल मेरे बेटे जैसी है."
लेकिन वह जानती हैं कि केवल एक तस्वीर के भरोसे पक्का नहीं कहा जा सकता.
वह कहती हैं, "जब मेरे पति बैठे और उन्होंने मुझे तस्वीर दिखाई, तो मुझे राहत मिली. लेकिन उसी समय मैं बहुत परेशान हो गई और जब मैंने अपने बेटे को उस हालत में देखा तो मेरा दिल टूट गया. यह अपमानजनक था."
अल द्रिमली और अल मदून दोनों परिवारों का कहना है कि न तो उनका और न ही उनके बेटों का हमास या ग़ज़ा के किसी भी हथियारबंद समूह से कोई संबंध है.
बीबीसी ने दोनों के बारे में इसराइल प्रिज़न सर्विस से सवाल किया. उन्होंने कहा कि उनके पास दोनों में से किसी को हिरासत में रखने का कोई रिकॉर्ड नहीं है.
हमने यही सवाल इसराइली सेना के हिरासत केंद्र और जेल चलाने वाले विभाग से किया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया.
इसराइल बीबीसी समेत अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को ग़ज़ा में स्वतंत्र रूप से जाने की अनुमति नहीं देता है.
अल द्रिमली परिवार ने रेड क्रॉस से यह पता लगाने की कोशिश करने को कहा है कि क्या महमूद को हिरासत में लिया गया है. लेकिन इसराइल रेड क्रॉस को जेल रिकॉर्ड तक पहुंच की अनुमति नहीं देता.
इसराइल में काम करने वाली वकील ताल स्टीनर उन फ़लस्तीनियों का पता लगाने में मदद करती हैं, जिनके बारे में शक है कि इसराइल ने उन्हें हिरासत में लिया हो सकता है. उन्होंने बीबीसी से कहा, "7 अक्तूबर ने सब कुछ बदल दिया."
वह कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस को (जेलों में जाने पर) प्रतिबंध है और तथ्य यह है कि आईसीआरसी के पास खुद इसराइल की हिरासत में रखे गए लोगों की कोई सूची नहीं है, इसका मतलब है कि हमें परिवारों के अनुरोध पर एक-एक करके, व्यक्तिगत तौर पर उनका पता लगाना पड़ता है. आज इन लोगों को खोजने की क्षमता पर इसका बड़ा दबाव है."
वह यह भी कहती हैं कि परिवारों के लिए सबसे मुश्किल बात यह है कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है.
ताल स्टीनर बताती हैं, "यह एक हरा घाव है. यह भरता नहीं है. उन्हें यह तक नहीं पता कि उनका सगा ज़िंदा है या मर चुका है और उन्हें कोई सुकून नहीं मिलता."
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