
नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ से रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग ज़िले बुरी तरह प्रभावित; ईशा फ़ाउंडेशन के 80 लोग भी लापता।
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन से 332 लोगों की मौत हो गई है और 900 से अधिक लापता हैं। लापता लोगों में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए लगभग 300 भारतीय शामिल हैं। ईशा फ़ाउंडेशन के 80 तीर्थयात्रियों से भी संपर्क नहीं हो पा रहा है। रसुवागढ़ी सीमा चौकी का इलाका सबसे अधिक प्रभावित है।
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कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल का रसुवा मार्ग निजी टूर ऑपरेटरों द्वारा संचालित किया जाता है। यह मार्ग काठमांडू से तिब्बत के ग्यिरोंग तक जाता है और तीर्थयात्रियों के बीच लोकप्रिय है।
नेपाल के भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद मरने वालों की संख्या 332 हो गई है। अब तक 900 से अधिक लोग लापता हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
नेपाल के विदेश मंत्री ने कहा है कि भारत के क़रीब 300 लोग लापता हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए तीर्थयात्री शामिल हैं।
इस बीच भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि तमिलनाडु से मानसरोवर की यात्रा पर गए 21 लोगों को नेपाल में सुरक्षित बचा लिया गया है।
बुधवार को आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने बताया कि उनके ईशा फ़ाउंडेशन के 80 लोग इस आपदा से प्रभावित हो सकते हैं और उनके बारे में कोई ख़बर नहीं है।
जग्गी वासुदेव ने कहा, "कुल 80 लोग हैं, जिनमें 34 पुरुष और 46 महिला शामिल हैं, साथ ही कुछ अन्य वालंटियर भी हैं जो पास के होटलों में ठहरे हुए हैं। जितनी बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, स्थिति बहुत खराब लग रही है। अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है।"
ईशा फ़ाउंडेशन के ग्रुप में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी और भारत समेत 19 देशों के श्रद्धालु शामिल हैं। गुरुवार को जग्गी वासुदेव ने प्रशासन से ग्यिरोंग जाने की अनुमति मांगी है।
ग्यिरोंग काउंटी का बॉर्डर चीन और नेपाल के बीच टूरिस्ट और ट्रैफिक के लिए मेन क्रॉसिंग पॉइंट है। वहां क़रीब 4,000 लोग रहते हैं।
बुधवार सुबह तिब्बत से होकर बहने वाली नदी में अचानक आई बाढ़ से नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा और चितवन ज़िले प्रभावित हुए हैं।
फ़्लैश फ़्लड से कैलाश मानसरोवर जाने वाले मुख्य रास्तों में से एक रसुवा ज़िले में सड़कें, पुल और संचार संपर्क पूरी तरह तबाह हो चुके हैं।
समुद्र तल से 6,638 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में विशेष मान्यता है। और हर साल सैकड़ों तीर्थ यात्री यहां की यात्रा करते हैं।
भारत सरकार तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन हर साल जून से सितंबर के दौरान दो अलग-अलग मार्गों - लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड)- धारचूला या दिल्ली, और नाथू ला दर्रा (सिक्किम)- गंगटोक या दिल्ली से कराती है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, कैलाश मानसरोवर यात्रा को कोई भी निजी संस्था लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथुला (सिक्किम) से आयोजित नहीं कराती है।
लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) के रास्ते पर क़रीब 200 किलोमीटर ट्रैकिंग करनी पड़ती है। जबकि नाथु ला दर्रे वाले मार्ग पर क़रीब 36 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी होती है।
एक तीसरा रूट है काठमांडू से, जिसे प्राइवेट टूर ऑपरेटर संचालित करते हैं। इस रूट में काठमांडू से नेपालगंज और फिर यहां से ज़मीन के रास्ते तिब्बत की यात्रा की जाती है।
नेपाल से कैलाश मानसरोवर जाने का रास्ता काठमांडू से शुरू होता है और निजी टूर ऑपरेटरों की ओर से संचालित सड़क या हेलीकॉप्टर मार्गों से तिब्बत पहुंचता है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, तिब्बत में ग्यिरोंग और नेपाल में रसुवा से होकर जाने वाले सड़क मार्ग से क़रीब 10 से 14 दिनों का समय लगता है।
इसमें काठमांडू से सड़क मार्ग से सीमा चौकी तक और फिर तिब्बत में दारचेन तक यात्रा जारी रहती है। दारचेन से पैदल यात्रा शुरू होती है।
दूसरा हेलीकॉप्टर मार्ग नेपालगंज और सिमिकोट/हिल्सा होकर जाता है। इसमें करीब 5 से 11 दिन लगते हैं। इसमें काठमांडू से नेपालगंज, फिर छोटे विमान से सिमिकोट और उसके बाद हेलीकॉप्टर से सीमा पर स्थित हिलसा पहुंचना होता है।
यहां से पुरांग और कैलाश पर्वत तक छोटी दूरी सड़क से तय की जाती है।
इन यात्रियों के लिए वैध पासपोर्ट और चीन के विशेष परमिट जरूरी होते हैं। इनमें चीनी ग्रुप वीजा और तिब्बत ट्रैवल परमिट शामिल हैं।
हर साल मई से सितंबर के बीच बड़ी संख्या में यात्री इन मार्गों से जाते हैं।
रसुवा और यहां की रसुवागढ़ी सीमा चौकी नेपाल से तिब्बत में कैलाश मानसरोवर जाने के रास्ते का मुख्य गेटवे है।
यात्रा काठमांडू से शुरू होकर रसुवा ज़िले से गुजरती है और नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी सीमा चौकी तक पहुंचती है।
बुधवार को हुई आपदा का केंद्र भी यही इलाक़ा था। यहां बड़े पैमाने पर तबाही हुई है।
यहां से सीमा पार करने के बाद रास्ता सीधे तिब्बत के अंदर जिरोंग पोर्ट तक जाता है। इसके बाद यात्रा कैलाश मानसरोवर की ओर बढ़ती है।
तिब्बत और नेपाल के बीच सीमा चौकी रसुवागढ़ी तक काठमांडू से पहुंचने में करीब 6 से 8 घंटे लगते हैं। इसके लिए उनका चीनी ग्रुप वीज़ा और तिब्बत ट्रैवल परमिट पहले से तैयार और मंजूर होना जरूरी है।
आम तौर पर रसुवागढ़ी में चीनी ग्रुप वीज़ा और तिब्बत ट्रैवल परमिट के लिए इंतज़ार करना नहीं पड़ता क्योंकि पहले से इसे हासिल कर लिया जाता है। और दस्तावेज़ पूरा होने के बाद ही काठमांडू से लोग यात्रा शुरू करते हैं।
नेपाल के टूरिज़्म डिपार्टमेंट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में रसुवागढ़ी सीमा चौकी से गुजरने वाले यात्रियों की संख्या 13,523 थी।
यह रूट विदेशी यात्रियों में लोकप्रिय है क्योंकि भारत सरकार द्वारा संचालित दो रूट केवल भारतीय नागरिकों के लिए होते हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए विदेश मंत्रालय ने नियम बनाए हैं। इसके तहत सबसे पहली योग्यता है कि तीर्थयात्री को भारतीय नागरिक होना चाहिए।
तीर्थयात्री के पास 1 सितंबर को कम से कम छह महीने की वैधता वाला भारतीय पासपोर्ट होना चाहिए। चल रहे वर्ष की 1 जनवरी को कम से कम 18 साल और अधिकतम 70 वर्ष की आयु होनी चाहिए।
तीर्थ यात्रा के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण बात है बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई। सिर्फ़ 25 या उससे कम बीएमआई वाले व्यक्ति को ही इस यात्रा पर जाने की अनुमति होती है।
इस यात्रा के लिए व्यक्ति का शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी आवश्यक है।
यात्रा में विदेशी नागरिक आवेदन नहीं कर सकते हैं। इसके साथ ही ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया यानी ओसीआई कार्ड रखने वाले लोग भी इस यात्रा में आवेदन नहीं कर सकते हैं।
इस यात्रा के लिए सफल ऑनलाइन आवेदन के बाद विदेश मंत्रालय ड्रॉ से तीर्थयात्रियों का चुनाव करता है।
ड्रॉ के साथ ही यात्री के मार्ग और बैच का आवंटन कर दिया जाता है। यात्रा शुरू करने से पहले मेडिकल जांच होती है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक सभी यात्रियों का एक साथ यात्रा करना और लौटना अनिवार्य है। सभी यात्रियों के लिए यात्रा शुरू करने का स्थान दिल्ली है।
यात्रा शुरू करने से पहले आपको मंत्रालय के निर्धारित अधिकारियों को वैध पासपोर्ट, छह पासपोर्ट साइज रंगीन तस्वीरें और 100 रुपए का नोटरी सत्यापित क्षतिपूर्ति बांड देना होता है।
इसके साथ ही आपात स्थिति में हेलीकॉप्टर निकासी के लिए एफिडेविट और चीनी क्षेत्र में मौत के बाद पार्थिव शरीर का वहीं अंतिम संस्कार करने का सहमति पत्र भी देना होता है।
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जग्गी वासुदेव द्वारा ग्यिरोंग जाने की अनुमति के लिए प्रशासन से संपर्क जारी रहेगा।
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नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटेकोशी नदी में पानी और मिट्टी के बहाव के कारण बचाव अभियान प्रभावित हुआ है। नेपाल में मरने वालों की संख्या 489 तक पहुंच गई है और 900 से अधिक लोग लापता हैं। चीनी अधिकारियों ने बांध टूटने की खबरों को खारिज करते हुए इसे पानी का ओवरफ्लो बताया है।
A Himalayan collapse triggered a rapid flood that traveled 200km from the Nepal-Tibet border, causing fatalities in Nepal and reaching Maharajganj, India. Authorities issued warnings after the surge had already entered the river system.

नेपाल में विनाशकारी फ़्लैश फ़्लड से 469 लोगों की मृत्यु हो गई है और 977 लोग लापता हैं। आपदा के बाद चीन द्वारा समय पर चेतावनी न देने के आरोपों पर विवाद बढ़ गया है, हालांकि चीनी दूतावास ने इन दावों का खंडन किया है और सहयोग का वादा किया है।

नेपाल के रसुवा ज़िले में भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद तमिलनाडु और पुडुचेरी के 100 से अधिक तीर्थयात्री फंस गए हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने 21 लोगों के सुरक्षित होने की पुष्टि की है, जबकि अन्य के परिवारों ने सरकार से सुरक्षित वापसी की अपील की है।

नेपाल में बाढ़ के कारण 389 लोगों की मौत हो गई है और 910 लोग लापता हैं। लापता लोगों में विदेशी नागरिक, नेपाल सेना और पुलिस के कर्मी शामिल हैं। भारत और चीन समेत कई देश राहत कार्यों में जुटे हैं।
Nepal declined foreign search and rescue team offers after flash floods along the Bhotekoshi and Trishuli river systems killed at least 469 people and left hundreds missing, relying instead on domestic security forces.