गुजरात के तटीय गाँव: समुद्र के कटाव से अस्तित्व पर संकट
वलसाड ज़िले के भागल जैसे गाँव समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटरेखा के कटाव के कारण विलुप्त होने की कगार पर हैं।
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गुजरात के वलसाड ज़िले में समुद्र के तेज़ी से हो रहे कटाव के कारण भागल सहित कई गाँव डूबने के ख़तरे में हैं। स्थानीय लोग सुरक्षा दीवार की माँग कर रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ इसे रेत खनन और मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम बता रहे हैं।
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Why It Matters
गुजरात में पिछले 28 वर्षों में 537 किलोमीटर से अधिक तटरेखा का कटाव हुआ है। वलसाड और नवसारी जैसे ज़िले इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं।
एक समय था जब समुद्र हमारे गाँव से दो किलोमीटर से भी अधिक दूर था. तट के किनारे हमारे नारियल के बाग और बोरवेल थे. मीठे पानी के कुएं भी थे. अब सब कुछ नष्ट हो गया है. हमें डर है कि अगर समुद्र इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो हमारा गांव भी तबाह हो जाएगा.
ये शब्द वलसाड ज़िले के भागल गांव के निवासी सुमनभाई टंडेल के हैं. इस क्षेत्र में लगभग एक दर्जन गांव हैं जो समुद्र के बहुत क़रीब स्थित हैं और तटरेखा के तेज़ी से हो रहे कटाव के कारण उनका अस्तित्व ख़तरे में है. लेकिन भागल के लोगों की चिंताएं अधिक गंभीर हैं क्योंकि यह गांव समुद्र तल से नीचे स्थित है.
कुछ स्थानों पर, समुद्र और गांव के बीच भूमि की एक बहुत पतली पट्टी ही बची है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर भारी बारिश या ऊंची लहरों के दौरान यह पट्टी बह जाती है, तो गांव को बचाना मुश्किल होगा.
वलसाड ज़िले के दंती, काकवाड़ी, दांडी, भागल जैसे गांव एक दूसरे के नज़दीक हैं. ये सभी गांव वर्तमान में समुद्र के कारण ख़तरे का सामना कर रहे हैं. सुमनभाई टंडेल कहते हैं, "एक समय था जब समुद्र तट पर हमारे पास ऐसे कुएं थे जिनमें साल भर खारा पानी रहता था. इसके अलावा, मछुआरे अपना सामान वहीं रखते थे और अपनी नावों को वहीं लंगर डालकर रोकते थे. अब वह पूरा इलाक़ा समुद्र में डूब गया है. पिछले 15 से 20 सालों में कटाव सबसे तेज़ रहा है."
"अगर इस कटाव को रोकने के लिए अभी ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो 12 से 15 गांव विलुप्त हो जाएंगे. हाल ही में नेपाल में जिस तरह पानी का बहाव हुआ, वैसा ही यहां भी हो सकता है."
राज्य सरकार ने इन गांवों को समुद्र से बचाने के लिए एक सुरक्षा दीवार बनाने का काम शुरू कर दिया है, जिसमें दांती गांव के पास एक सुरक्षा दीवार का निर्माण किया जा चुका है, लेकिन बाक़ी के गांव मांग कर रहे हैं कि उनके यहां भी जल्द से जल्द एक दीवार बनाई जाए.
भागल के लोग कहते हैं कि उनकी ज़मीन कभी बहुत उपजाऊ थी और अच्छी फ़सलें देती थी. इसके अलावा, यह फलों के लिए भी सही थी. अब पानी खारा होता जा रहा है और साथ ही, मिट्टी में खारापन होने की वजह से फ़सलें काटना मुश्किल हो रहा है. गांव के सरपंच आनंद पटेल ने कहा, "एक समय में हमारे गाँव में बोड़ा के बहुत सारे खेत थे और गांव बोड़ा के लिए मशहूर था. इसके अलावा, यहां ग्वार की भी बहुत अच्छी पैदावार होती थी. इसी तरह, नारियल के खेत भी थे. लेकिन जैसे ही मिट्टी में खारापन आने लगा, बोड़ा के पेड़ ख़त्म हो गए. नारियल के पेड़ भी ज़्यादा खारापन बर्दाश्त नहीं कर पाते, इसलिए वे अब नहीं रहे."
अभी, यहाँ कुछ जगहों पर धान की रोपाई हुई है, लेकिन पिछले दो हफ़्तों से बारिश न होने की वजह से धान के पौधों की जड़ों में खारापन आ गया है और वे सफ़ेद हो गए हैं. किसानों का कहना है कि अगर तुरंत बारिश नहीं हुई, तो यह फ़सल ख़राब हो जाएगी. लगभग तीन हज़ार की आबादी वाले गांव के ज़्यादातर लोग खेती और मछली पकड़ने पर निर्भर हैं.
हालांकि वलसाड के तटीय गांवों के लोग एक प्रोटेक्शन वॉल की मांग कर रहे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कोई स्थाई या असरदार समाधान नहीं है. सूरत के ब्रैकिश वॉटर रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष एमएसएच शेख ने बीबीसी को बताया, "अभी जो प्रोटेक्शन वॉल बनी है, वह भी कुछ सालों में समुद्र के थपेड़ों से टूट जाएगी. अगर हमें तटीय कटाव को रोकना है, तो सबसे पहले, कुदरती प्रोसेस में इंसानी दख़ल को रोकना होगा. यानी, इस इलाक़े में ग़ैर-क़ानूनी रेत माइनिंग को रोकना चाहिए. या इस गांव के लोगों को कहीं और बसाना चाहिए."
2024 के एनवायरनमेंटल स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़, पिछले 28 सालों में गुजरात में 537 किलोमीटर से ज़्यादा तटरेखा का कटाव हुआ है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य सरकार ने 16वें फाइनेंस कमीशन को बताया कि गुजरात के 449 गांव तटके कटाव से प्रभावित हैं. इसका सबसे ज़्यादा असर वलसाड, नवसारी, सूरत, भरूच और जामनगर ज़िलों में देखा गया है.
दूसरी ओर, वलसाड के विधायक भरत पटेल ने बीबीसी को बताया, "वलसाड तालुका में हमारे पास 16 किलोमीटर लंबी तटरेखा है. इसमें दांडी, भागल, काकवाड़ी, कोसांबा, दांती वगैरह गांव शामिल हैं."
Open Questions
- क्या सरकार प्रभावित गाँवों के पुनर्वास के लिए कोई योजना बना रही है?
- अवैध रेत खनन को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे?

